25 सितंबर 2026
आरबीआई बुलेटिन – सितंबर 2026
आज रिज़र्व बैंक ने अपने मासिक बुलेटिन का सितंबर 2026 का अंक जारी किया। इस बुलेटिन में सात भाषण, तीन आलेख और वर्तमान सांख्यिकी शामिल हैं।
उपर्युक्त तीन आलेखों के शीर्षक इस प्रकार हैं:. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. ऋण-जमा विचलन: तुलन-पत्र का विश्लेषण; और III. निजी कॉर्पोरेट निवेश: 2025-26 में संवृद्धि तथा 2026-27 की संभावना।
I. अर्थव्यवस्था की स्थिति
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव फिर से बढ़ने के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बार फिर बढ़ती ऊर्जा कीमतों और वित्तीय बाजारों के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ी हुई अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर जारी उथल-पुथल के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की सुदृढ़ वृद्धि दर्ज की। उच्च आवृत्ति वाले संकेतकों से स्पष्ट है कि अगस्त माह के दौरान भी अर्थव्यवस्था आघात-सह बनी रही। सुदृढ़ निर्यात वृद्धि के समर्थन से वाणिज्यिक वस्तुओं का व्यापार घाटा कम हुआ। खाद्य और पेय पदार्थ समूह के कारण अगस्त में हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई, साथ ही ईंधन और मुख्य घटकों में भी वृद्धि हुई। एफसीएनआर(बी) जमाराशियों के अंतर्वाह के बाद प्रणालीगत चलनिधि अधिशेष में तीव्रता से वृद्धि हुई। वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मध्यम चालू खाता घाटे और मजबूत एफडीआई अंतर्वाह ने बाह्य क्षेत्र को समर्थन दिया तथा विदेशी मुद्रा भंडार सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया।
II. ऋण-जमा विचलन: तुलन-पत्र का विश्लेषण
सौरभ घोष, प्रभात कुमार, मधुरेश कुमार और मोनिका
वित्तीय वर्ष 2023 से बैंक ऋण की वृद्धि मुख्यतः कुल जमाराशियों की वृद्धि से अधिक रही है, जिससे ऋण की तुलना में जमाराशि (सीडी) का अनुपात 80 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया है। इस बढ़ते अंतर ने ऋण वृद्धि की संधारणीयता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं। इसी पृष्ठभूमि में, वर्तमान लेख सीडी अनुपात को प्रभावित करने वाले कारकों का परीक्षण करता है।
मुख्य बातें:
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आधुनिक मौद्रिक प्रणाली में, जब बैंक ऋण देते हैं या निवेश करते हैं, तो उसी समय जमाराशियों का सृजन होता है। यह ज़रूरी नहीं है कि ऋण देने से पहले बैंकिंग प्रणाली को जमाराशियों जैसी देयताएँ जुटानी पड़ें। अतः ऋण-सृजन के लिए जमाराशियाँ अनिवार्य बाधा नहीं हो सकती हैं।
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तदनंतर, लाभप्रदता संबंधी विचार-विमर्श, जमाराशियों की अंतर-बैंक गतिशीलता और विवेकपूर्ण विनियमन, ऋण वृद्धि को अंतर्निहित आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखने में सहायक होते हैं।
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अंततः, बैंक विनियामकीय ढाँचे के अंतर्गत अपनी लाभप्रदता संबंधी विचार-विमर्श के आधार पर ऋण प्रदान करने का निर्णय लेते हैं। जहाँ ऋण प्रदान करने से निधियों के वैकल्पिक उपयोगों की तुलना में जोखिम-समायोजित प्रतिफल अधिक मिलता है, वहाँ बैंक ऋण का विस्तार जारी रखते हैं। इस अध्ययन के निष्कर्ष से यह भी पता चलता है कि सीडी अनुपात, अपने आप में, उच्च स्तरीय ऋण-वृद्धि वाली बैंकिंग प्राणली की निधीयन संबंधी भेद्यता को मापने के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं हो सकता।
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इसके अलावा, भारत में सीडी अनुपात में हाल की वृद्धि एक विकसित होती अर्थव्यवस्था और सुदृढ़ बैंकिंग प्रणाली के साथ भी जुड़ी हुई है, जहाँ प्रणालीगत स्तर पर विवेकपूर्ण लक्ष्यों को पर्याप्त रूप से पूरा किया जा रहा है। मार्च 2026 के अंत में उच्च सीडी अनुपात का कारण देयता पक्ष में हुए समायोजन थे, जैसे कि पूर्ववर्ती अवधियों की तुलना में कम लागत पर अधिक उधार लेना और पूंजी में वृद्धि। इसके अलावा, आस्तियों की संरचना में बदलाव, जिसमें आरक्षित निधियों एवं अन्य शेष राशियों का पुनर्विनियोजन शामिल है, ने भी ऋण प्रवाह को समर्थन दिया।
III. निजी कॉरपोरेट निवेश: 2025-26 में संवृद्धि और 2026-27 की संभावना
पूर्णेंदू कुमार, स्निग्धा योगींद्रन, सूक्ति खांडेकर, और भव्यश्री के.
निजी कॉरपोरेट क्षेत्र द्वारा की जाने वाली निवेश गतिविधियाँ आर्थिक वृद्धि को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह लेख, निजी कॉरपोरेट क्षेत्र द्वारा पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की चरणबद्ध योजनाओं के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, निवेश संबंधी उद्देश्यों के साथ-साथ निजी कॉरपोरेट क्षेत्र की निकट-अवधि की संभावना का आकलन प्रस्तुत करता है।
मुख्य बातें:
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बैंकों और वित्तीय संस्थाओं (एफआई) द्वारा मंजूर की गई परियोजनाओं की कुल लागत के साथ-साथ परियोजनाओं की संख्या में भी पिछले वर्ष की तुलना में 2025-26 के दौरान वृद्धि हुई, जो निजी कॉरपोरेट क्षेत्र की निवेश गतिविधियों में सुधार का संकेत देती है।
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बुनियादी ढाँचा क्षेत्र को प्रस्तावित पूंजी निवेश का बड़ा हिस्सा लगातार प्राप्त होता रहा, जिसमें विद्युत क्षेत्र का प्रमुख योगदान रहा।
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चरणबद्ध योजनाओं से संकेत मिलता है कि 2025-26 में निजी कॉरपोरेट क्षेत्र द्वारा प्रस्तावित कुल कैपेक्स में पिछले वर्ष के दौरान नियोजित कैपेक्स की तुलना में वृद्धि हुई।
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सभी वित्तपोषण माध्यमों को एक साथ ध्यान में रखते हुए प्रक्रियाधीन परियोजनाओं की चरणबद्ध प्रोफाइल से संकेत मिलता है कि 2026-27 में प्रस्तावित कैपेक्स ₹3.2 लाख करोड़ रहने का अनुमान है, जो निजी निवेश में निरंतर गति का संकेत देता है।
बुलेटिन के आलेखों में व्यक्त विचार लेखकों के हैं और ये भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/1196 |