
आरबीआई के सहभागी:
श्री शक्तिकांत दास – गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
श्री बी.पी. कानूनगो – उप गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
श्री एम. के. जैन – उप गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
डॉ. माइकल डी. पात्रा – उप गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
श्री एम. राजेश्वर राव – उप गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
श्री योगेश दयाल – चीफ जनरल मैनेजर, भारतीय रिज़र्व बैंक
योगेश दयाल (मध्यस्थ): आज नीति के बाद इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में आप सभी की उपस्थिति वाकई बहुत खुशी की बात है। आज, माननीय गवर्नर के साथ, हमारे सम्मानित उप गवर्नर, श्री बी. पी. कानूनगो, श्री एम. के. जैन, डॉ. माइकल पात्रा, और श्री एम. राजेश्वर राव हैं। मैं इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के इस कार्यक्रम के सभी कार्यपालक और उच्च प्रबंधन का स्वागत करता हूँ। सर, आज हमारे पास लगभग 38 प्रतिभागी हैं, और वे अलग-अलग मीडिया जैसे प्रिंट, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक हाउस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। मैं कुछ घोषणा करूँगा और फिर मीडिया वालों को आगे बढ़ने के लिए दे दूँगा। हम ज़्यादा से ज़्यादा प्रश्नों को शामिल करने की कोशिश करेंगे। मुझे सभी मीडिया के साथियों से सहयोग की अपेक्षा है। मैं अलग-अलग नाम पुकारूँगा, ताकि हम सीमित समय में सभी को शामिल कर सके। हमारे पास लगभग आधे घंटे का समय है। इसलिए, मैं आपसे अनुरोध करना चाहूँगा कि इस मौके का पूरा लाभ उठाएँ। एक बार फिर, इस ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में आपका स्वागत है। और आपकी अनुमति से सर, हम पहला प्रश्न शुरू करेंगे।
शक्तिकांत दास:
जी, हाँ, कृपया पूछिए।
योगेश दयाल:
मैं इकॉनॉमिक टाइम्स के श्री गोवर्धन रंगन से अनुरोध करूँगा कि वे कृपया अपना प्रश्न पूछें।
गोवर्धन रंगन, द इकॉनॉमिक टाइम्स:
सर, आपने ब्याज दर, निभावकारी रुख, सब कुछ वैसा ही रखा है, इस राजकोषीय वर्ष के दूसरी छमाही और अगले राजकोषीय वर्ष के पहली छमाही में भी ज़्यादा महंगाई का अनुमान लगाने के बावजूद और हमारे बाजार असल में नीति दर से निपट रहे हैं, ऐसे में डर है कि यदि आपूर्ति पक्ष ने रिस्पॉन्ड नहीं किया तो अगले वर्ष महंगाई बढ़ सकती है। क्या एमपीसी ने इस बारे में बहस की और यह कब इस बात का इशारा बन जाएगा कि एमपीसी को अपना रुख बदलना होगा? तो, आधार क्या होंगे?
शक्तिकांत दास:
सबसे पहले, सभी प्रतिभागियों को नमस्कार। आप सभी को देखकर और इतने लंबे अंतराल के बाद आप लोगों से बातचीत करके सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है। और, आइए उम्मीद करते कि हम जल्द ही एक वास्तविक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर पाएंगे। लेकिन आपके खास प्रश्न पर आते हुए, मैंने अपने वक्तव्य में इस बारे में काफी विस्तार से बताया है। पहला बिंदु यह है कि महंगाई की रफ्तार को काबू में करने के लिए एक मौका उपलब्ध है। मैंने कहा है कि सर्दियों के महीने त्योहारों के आगमन, खरीफ की बंपर फसल के आने, और विभिन्न रोकथाम व आपूर्ति में आई रुकावटों के दूर होने के साथ आते हैं—ये रुकावटें अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। साथ ही, अधिकारियों—विशेष रूप से सरकार—की ओर से विभिन्न मोर्चों पर कार्रवाई करने के लिए हस्तक्षेप भी किए जा रहे हैं। हमने हाल के हफ्तों में कुछ कार्रवाई देखी है; उदाहरण के लिए, खाने के तेल पर आयात शुल्क—जो उन घटकों में से एक है जहाँ महंगाई स्पष्ट दिख रही थी—को कम कर दिया गया है। आप उन सभी उपायों से अवगत हैं जो किए गए हैं, और हम लगातार स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं। और जैसा कि मैंने कहा है, हम बहुत सतर्क बने रहेंगे और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, वैसे-वैसे उचित निर्णय लेते रहेंगे। धन्यवाद।
योगेश दयाल:
सर, मैं बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनूप रॉय से अगला प्रश्न पूछने का अनुरोध करूँगा।
अनूप रॉय, बिज़नेस स्टैंडर्ड:
नमस्कार, गवर्नर। मेरा प्रश्न यह है कि एक वर्ष की दरें भी ओवरनाइट रेपो दर से कम हैं। क्या इससे आपकी मौद्रीक नीति के संचालन में कोई चुनौती आती है, या यह जान-बूझकर किया गया है ताकि हम इसे इसी तरह बनाए रखें? इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है? और, आपने चलनिधि के मोर्चे पर ऐसा कुछ खास नहीं किया है; आपने चलनिधि हटाई नहीं है, बल्कि और अधिक और पर्याप्त चलनिधि का भरोसा दिलाया है। तो, भविष्य में हालात कैसे रहेंगे?
शक्तिकांत दास:
मैंने भरोसा दिलाया है कि चलनिधि उपलब्ध रहेगी, लेकिन मैं आरबीआई के साथ आज की मीडिया बातचीत को जितना हो सके, उतना ज़्यादा सहभागी बनाना चाहता हूँ। इसलिए मैं अपने उप गवर्नर डॉ. माइकल पात्रा से इस प्रश्न का जवाब देने का अनुरोध करूँगा।
डॉ. माइकल डी. पात्रा:
धन्यवाद, गवर्नर। जैसा कि गवर्नर ने बताया, चलनिधि का स्तर असल में मौद्रीक नीति के रुख पर निर्भर करता है, और एमपीसी ने मौद्रीक नीति में एक नरम रुख अपनाया है और समय-सीमा के साथ मार्गदर्शन दिया है। इसलिए, आप उम्मीद कर सकते हैं कि बाज़ार के लिए चलनिधि आरामदायक रहेगी। ठीक है, तो जो दरें आप देख रहे हैं, वे रिवर्स रेपो दर से नीचे हैं, क्योंकि आमतौर पर संपार्श्विक दरें बिना संपार्श्विक दरों से कम होती हैं। एक और बात जो आपको ध्यान में रखनी चाहिए, वह यह है कि मुद्रा बाजार में जो कुछ हो रहा है, वह चलनिधि के वितरण का नतीजा है; चलनिधि का वितरण असमान है, जिसमें जिन लोगों की एलएएफ तक पहुँच है, वे एलएएफ कॉरिडोर के भीतर या उसके बराबर दरें बता रहे हैं। लेकिन म्यूचुअल फंड और अन्य जैसे गैर-बैंक संस्था, जिनकी एलएएफ तक पहुँच नहीं है, वे इससे कम दरें बता रहे हैं। हमारा खुला प्रयास यह है कि बैंक बाज़ार में इन प्रवाहों के बीच मध्यस्थता करें और दरों में और ज़्यादा एकरूपता आए; हम बाज़ार की प्रक्रियाओं में दखल नहीं देना चाहते। हम जो कर रहे हैं, वह यह है कि हम बाज़ारों का विकास कर रहे हैं। बाज़ार विकास के आधार पर गवर्नर ने जिन उपायों की पूरी श्रृंखला की घोषणा की है, उनका उद्देश्य और ज़्यादा प्रतिभागियों को लाना और चलनिधि के और अधिक समान वितरण को संभव बनाना है।
योगेश दयाल:
धन्यवाद। मैं मिंट की गोपिका से अपना प्रश्न पूछने का अनुरोध करूँगा।
गोपिका गोपाकुमार, मिंट:
सर, आपने उन दो बैंक बेलआउट्स के बारे में बात की जो हुए थे। हमने बॉन्डहोल्डर्स के मामले में आरबीआई का रुख देखा है, जहाँ बॉन्डहोल्डर्स को नुकसान उठाना पड़ा था, जब आरबीआई ने बैंकों से इन बॉन्ड्स को राइट-डाउन करने के लिए कहा था। मैं यह जानना चाहूँगी—क्या यह आरबीआई के रुख में पिछले वर्षों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है? पहले जब ऐसे बैंक बेलआउट्स हुए थे, तब आरबीआई का रुख अलग था, लेकिन अब आरबीआई बॉन्डहोल्डर्स के प्रति उदासीन दिख रहा है। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात, क्या आरबीआई यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि भविष्य में बैंकों द्वारा इन बॉन्ड्स की गलत तरीके से बिक्री न हो?
शक्तिकांत दास:
आरबीआई अर्थव्यवस्था या वित्तीय बाज़ारों के किसी भी भाग के प्रति उदासीन नहीं है। हम सबसे पहले जमाकर्ताओं के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेते हैं। जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना भारतीय रिज़र्व बैंक की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, और हमारे सभी कार्य कानूनी दायरे में, कानून के अनुसार और विनियामक दिशानिर्देशों के अनुसार होते हैं। इसके अलावा, चूंकि दोनों मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं, इसलिए मैं इस पर और ज़्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा। धन्यवाद।
योगेश दयाल:
क्या मैं 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के मयूर शेट्टी से अपना प्रश्न पूछने का अनुरोध कर सकता हूं?
मयूर शेट्टी, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया:
नमस्कार सर। मेरा प्रश्न बैंकों की संपत्ति की गुणवत्ता पर है। हालांकि 30 अगस्त को कर्ज़ चुकाने में छूट खत्म हो गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारणों से से अभी भी एक तरह से रोक लगी हुई है। तो क्या वित्तीय प्रणाली पर कोविड का दबाव अभी महसूस होना बाकी है? और, क्या बैंकों के लिए सबसे बुरा दौर अभी आना बाकी है? मेरा मतलब है, यह प्रश्न मूडीज़ के कल के उस वक्तव्य के संदर्भ में है जिसमें कहा गया था कि इटली और भारत, इस झटके के आर्थिक और वित्तीय नतीजों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
शक्तिकांत दास:
देखिए, हमने संभावित एनपीए परिदृश्य का अपना आंतरिक आकलन कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में है। हम अदालत के आदेशों का इंतज़ार करेंगे, लेकिन हमने अपने आंतरिक अनुमान लगा लिए हैं। और जैसा कि आप अच्छी तरह जानते होंगे, 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' दिसंबर 2020 के आखिरी सप्ताह में आने वाली है। जैसे ही हमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश मिलेंगे और जैसे ही हम संभावित एनपीए परिदृश्य के अपने आकलन को अद्यतन कर लेंगे, हम इसे 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' में विस्तार से बताएंगे, जो दिसंबर के आखिरी सप्ताह में जारी की जाएगी। पिछली 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' में हमने एक परिदृश्य दिया था, लेकिन एक सकारात्मक बात यह है कि अर्थव्यवस्था उस समय की उम्मीद या अनुमान से कहीं ज़्यादा तेज़ी से पटरी पर लौटी है। इसलिए, कृपया 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' आने तक इंतज़ार करें, जिसमें हम सभी विवरण विस्तार से बताएंगे। धन्यवाद।
योगेश दयाल:
क्या मैं 'ज़ी बिज़नेस' की स्वाति खंडेलवाल से अपना प्रश्न पूछने का अनुरोध कर सकता हूं?
स्वाति खंडेलवाल, ज़ी बिज़नेस:
गवर्नर साहब, मेरा प्रश्न आपसे बैंकों के असफल होने के बारे में है। आरबीआई की तरफ से समय पर दखल दिया गया, लेकिन मैं शेयरहोल्डर्स के नमाध्यम से एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने अपनी पूरी पूंजी गँवा दी। क्या आपको लगता है कि हमें कोई बेहतर तरीका अपनाना चाहिए जिससे शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा की जा सके?
शक्तिकांत दास:
मुझे लगता है कि मैंने अपने वक्तव्य में इस प्रश्न का जवाब पहले ही दे दिया है। ऐसे मामलों में हम जो भी निर्णय लेते हैं, उन पर कोई एक निर्धारित फ़ॉर्मूला लागू करना मुश्किल होता है। क्योंकि, हर बैंक की स्थिति अलग-अलग होती है, इसलिए हर मामले के हिसाब से अलग निर्णय लेना पड़ता है। और दूसरी बात यह है कि हम जो भी निर्णय लेते हैं, वह जमाकर्ताओं के सबसे बड़े हित में होता है। ये निर्णय कानूनी प्रावधानों और विनियामकीय दिशा निर्देशों का पालन करते हुए लिए जाते हैं। इसके अलावा, मैं इस समय इस मामले पर और ज़्यादा कुछ नहीं कहना चाहूँगा, क्योंकि यह मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है।
योगेश दयाल:
मैं सीएनबीसी की लता वेंकटेश से अनुरोध करूंगा कि वे अपना प्रश्न पूछें।
लता वेंकटेश, सीएनबीसी टीवी 18:
धन्यवाद, गवर्नर साहब। जैसा कि आप जानते हैं, बाज़ार में काफी चलनिधि है और आपने ओएमओ को रोक दिया है या कम कर दिया है, और इसकी जगह 'ऑपरेशन ट्विस्ट' का ज़्यादा उपयोग किया है। क्या आपको इस बात की चिंता है कि यह अतिरिक्त चलनिधि कोई गड़बड़ कर सकती है? जैसे कि शायद महंगाई को बढ़ाना या जोखिम की गलत कीमत निर्धारित करना। इसके अलावा, आरबीआई के एक आंतरिक कार्य समूह ने कॉरपोरेट्स को बैंक लाइसेंस देने और कॉरपोरेट्स के स्वामित्व वाली एनबीएफसी को लाइसेंस देने के बीच एक अंतर बताया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने संकेत दिया है कि एनबीएफसी को अपने आप बैंक लाइसेंस दिए जा सकते हैं। क्या ये सचमुच अलग हैं? कॉरपोरेट्स को दिए जाने वाले लाइसेंस और कॉरपोरेट्स के स्वामित्व वाली एनबीएफसी को दिए जाने वाले लाइसेंस?
शक्तिकांत दास:
दूसरे प्रश्न के बारे में, मैं बहुत स्पष्ट-स्पष्ट कहना चाहूंगा कि यह आरबीआई के एक आंतरिक कार्य समूह की रिपोर्ट है। इसे आरबीआई के दृष्टिकोण या निर्णय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए। आंतरिक कार्य समूह में दो बाहरी सदस्य थे, जो आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड के भी सदस्य हैं। इस समूह ने पूरी तरह से स्वतंत्र होकर कार्य किया है; उन्होंने आपस में स्वतंत्र रूप से विचार-विमर्श किया है और अपना एक दृष्टिकोण सामने रखा है। आरबीआई ने इन मुद्दों पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। जैसा कि मैंने अपनी मौद्रिक नीति के वक्तव्य में कहा था, और जैसा कि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं, हमारा दृष्टिकोण विचार-विमर्श वाला है। आंतरिक कार्य समूह की यह रिपोर्ट अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। हमें इस पर लोगों की राय मिलेगी। विभिन्न हितधारकों और अन्य लोगों से राय मिलने के बाद—जो भी हमें अपनी राय देना चाहते हैं—हम पूरे मामले की जांच करेंगे और सोच-समझकर कोई निर्णय लेंगे। स्थिति अभी यही है। अब, आपके प्रश्न के दूसरे भाग के बारे में, मैं चाहूंगा कि उप गवर्नर माइकल पात्रा जवाब दें।
डॉ. माइकल डी. पात्रा:
आपका प्रश्न उन साधनों के प्रकारों के बारे में था जिनका हम उपयोग कर रहे हैं। यदि आपको याद हो, तो अक्टूबर में, गवर्नर ने अपने मौद्रीक नीति वक्तव्य में वित्तीय बाजार को स्पष्ट तौर पर यह मार्गदर्शन दिया था कि हम कई तरह के तरीकों का उपयोग करेंगे ताकि यह पक्का हो सके कि बाजार में चलनिधि और वित्त प्रवाह बिना किसी रुकावट के चलता रहे। इसलिए, हम कई तरह के तरीकों का उपयोग करते आ रहे हैं, और बाजार की ज़रूरतों के हिसाब से उनकी मात्रा और उनके स्वरूप में बदलाव करते रहे हैं। इसी से यह बात स्पष्ट होती है कि हमने कई तरह के तरीके क्यों पेश किए हैं, और आने वाले समय में भी हम ऐसा ही करते रहेंगे। हाँ, यह बात बिल्कुल सही है कि आपने हमें याद दिलाया कि ज़्यादा चलनिधि से महंगाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन हम चलनिधि की स्थिति पर बहुत ही बारीकी से और लगातार नज़र रखे हुए थे।
वर्तमान में, हमारा आकलन यह है कि महंगाई का ज़्यादातर दबाव खुदरा स्तर पर आपूर्ति में आई रुकावटों, खुदरा व्यापारियों द्वारा लिए जा रहे बहुत ज़्यादा मार्जिन, और कुछ हद तक अप्रत्यक्ष कर के कारणों से से उत्पन्न हो रहा है। मांग का वह पहलू, जिससे आपकी भाषा में 'गड़बड़ी' पैदा हो सकती है, अभी भी शांत है; लेकिन हम इस पर लगातार नज़र रखे हुए हैं, और यदि हमें ऐसा होता हुआ दिखा, तो हम ज़रूरत के हिसाब से कदम उठाएँगे।
योगेश दयाल:
मैं इकॉनॉमिक टाइम्स नाउ की श्रीमती मैथिली से अनुरोध करूँगा कि वे अपना प्रश्न पूछें।
मैथिली भुसनुरमठ, इटी नाउ:
धन्यवाद, गवर्नर साहब। और आरबीआई की कम्युनिकेशन टीम को भी धन्यवाद कि उन्होंने हमें यह मौका दिया। गवर्नर साहब से सीधे प्रश्न पूछ पाना हमेशा अच्छा लगता है। तो आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। तो इसी के साथ, मैं शुरुआत करती हूँ। ऐसे समय में जब भारतीय रिज़र्व बैंक के अंदर ही एक आंतरिक समूह, महंगाई को काबू में रखने के संदर्भ में मौद्रिक नीति के ढांचे की समीक्षा कर रहा है, तो क्या आज के वक्तव्य को पढ़ने के बाद मेरा यह मानना गलत होगा कि आरबीआई ने असल में महंगाई को काबू में रखने के लक्ष्य को खत्म कर दिया है - कम से कम उस रूप में तो ज़रूर, जैसा हम इसे पहले जानते थे? इसका सीधा सा कारण यह है कि आपने भारतीय रिज़र्व बैंक के कुछ सबसे ज़रूरी उद्देश्यों की एक सूची दी है। गवर्नर साहब, आपने छह उद्देश्य गिनाए हैं - चलनिधि बढ़ाना, वित्तीय बाजारों को गहरा करना, पूंजी बचाना, निगरानी को मज़बूत करना, बाहरी व्यापार को आसान बनाना और भुगतान प्रणाली को बेहतर बनाना। इनमें से कहीं भी महंगाई को काबू में रखने का उल्लेख नहीं है - और वह भी ऐसे समय में, जब महंगाई हमारी निर्धारित ऊपरी सीमा 6% से काफी ऊपर चल रही है, और ऐसा पिछले लगभग तीन तिमाहियों से हो रहा है। असल में, यह वह समय है जब शायद आरबीआई को संसद में एक वक्तव्य देना चाहिए था कि उसने महंगाई को काबू में करने के लिए क्या कदम उठाए हैं। तो, क्या मेरा यह मानना गलत होगा कि किसी न किसी तरह से, असल में महंगाई को काबू में रखने का लक्ष्य - कम से कम उस रूप में तो ज़रूर, जैसा हम इसे पहले जानते थे - अब खत्म कर दिया गया है?
शक्तिकांत दास:
कुछ भी खत्म नहीं किया गया है। मैं बिल्कुल स्पष्ट और ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि कुछ भी खत्म नहीं किया गया है। महंगाई को काबू में रखना हमारी कार्यसूची में सबसे ऊपर है। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की प्रस्तावना में भी इसका उल्लेख है। हम इसे सबसे ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं। जिन प्राथमिकताओं का आपने उल्लेख किया है, वे प्राथमिकताएँ एमपीसी के प्रस्ताव के 'भाग बी' में शामिल हैं। एमपीसी के प्रस्ताव का 'भाग बी' अब वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। और जैसा कि पहले भी कई मौकों पर होता आया है, एमपीसी के प्रस्ताव के दो भाग होते हैं। पहला हिस्सा मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की चर्चाओं और उसके निर्णयों से जुड़ा होता है। तो, इसी तरह, प्रस्ताव के पहले भाग में, जिसे आज अपलोड किया गया है, और आज मेरे वक्तव्य के पहले भाग में, मैंने महंगाई, विकास, एमपीसी की चिंताओं, एमपीसी चीज़ों को कैसे देखती है और एमपीसी कैसे कार्य करने वाली है, से जुड़े मुद्दों पर रोशनी डाली है। मैंने एमपीसी की चर्चाओं का भी उल्लेख किया है। यह सिर्फ़ दूसरे भाग में है जहाँ मैं विकास और विनियामकिय उपायों की बात करता हूँ, जिनका एमपीसी की चर्चाओं से कोई लेना-देना नहीं है। यह दूसरे भाग में है, आरबीआई में हमने जो किया है, वह यह है कि हमने जो अलग-अलग घोषणाएँ की हैं, जो कुल मिलाकर लगभग 20 या 21 हैं, हमने बस उन घोषणाओं का सार बताने की कोशिश की है। तो, मैं फिर से दोहराना चाहूँगा कि महंगाई को लक्ष्य बनाना ज़रूरी है। आरबीआई एक बहु-उद्देशीय केंद्रीय बैंक है, यह सिर्फ़ महंगाई को टारगेट करने वाला केंद्रीय बैंक नहीं है। महंगाई को लक्ष्य बनाना बहुत ज़रूरी है। यह आरबीआई की प्रस्तावना का एक हिस्सा है, यह निश्चित रूप से सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। साथ ही, आरबीआई की बैंकिंग क्षेत्र और नॉन-बैंकिंग क्षेत्र के विनियामक के तौर पर, भुगतान प्रणाली के विनियामक के तौर पर और कई दूसरी तरह की ज़िम्मेदारियाँ भी हैं, और आप यह जानते हैं, मुझे इस पर ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है। मैं इसी तरह से इसे समझाना चाहूँगा।
योगेश दयाल:
धन्यवाद, सर। क्या मैं ब्लूमबर्ग क्विंट से इरा दुगल से एक प्रश्न पूछने का अनुरोध कर सकता हूँ?
इरा दुगल, ब्लूमबर्ग क्विंट:
नमस्कार, सर। सर, असल में कोर नीति पर प्रश्न है। अब, यदि आप ति3, ति4, 2020 और वित्तीय वर्ष 21 के छ1 के लिए दिए गए महंगाई लक्ष्य या महंगाई अनुमान को देखें, तो वे सभी कम से कम मिडपॉइंट से ऊपर हैं, जो महंगाई लक्ष्य का 4% है। अब, उस तरह के अनुमान सिनेरियो में, यह स्पष्ट नहीं है कि आप कहाँ गुंजाइश देखते हैं क्योंकि आप इस बात का इशारा करते रहते हैं कि नीति में ढील की गुंजाइश है, फिर भी, यह स्पष्ट नहीं है कि यदि ये महंगाई फोरकास्ट असल में, आप जानते हैं, उम्मीद के मुताबिक होते हैं तो वह कहाँ से सामने आएगा। तो, क्या हम ब्याज दर के बजाय चलनिधि के नजरिए से सिर्फ एक निभावकारी रुख बनाए रख रहे हैं? इसका उप-प्रश्न यह है कि नवंबर के आसपास महंगाई क्लिफ की उम्मीद थी, कि चीजें नीचे गिरेंगी, महंगाई बहुत जल्दी कम होगी। क्या अब यह बदल गया है, यह देखते हुए कि आप ज़मीन पर क्या देख रहे हैं?
शक्तिकांत दास:
मैंने अपने वक्तव्य में कहा है कि महंगाई पर हमारी उम्मीदें, जो हमें पिछले दो महीनों में थीं, ज़ाहिर है, वे पूरी नहीं हुई हैं। और हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम एक बहुत ही खास स्थिति से निपट रहे हैं, 100 वर्ष में एक बार होने वाली घटना, और इसका अर्थव्यवस्था के साथ-साथ इंसानी ज़िंदगी पर भी जो प्रभाव पड़ा है, वह सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि कई देशों में बहुत बड़ा है। इसलिए हमें इस खास स्थिति पर रिस्पॉन्ड करना होगा। और इसके अलावा, मुझे लगता है कि डॉ. माइकल पात्रा, आप कुछ और बताना चाहेंगे? मुझे लगता है कि वह हमारी बातचीत के बारे में और विस्तृत में बता सकते हैं, क्योंकि मुझे भी थोड़ा आराम करने और पानी पीने की ज़रूरत है। लेकिन गंभीरता से, मैं यह कहना चाहता हूँ कि, आपने मिड-पॉइंट के बारे में बात की। तो, जब मैंने कहा कि यह सौ वर्ष में एक बार होने वाली घटना है, जो आज की पीढ़ी की याद में पहले कभी नहीं हुई, तो यह आपके 2% से 6% की रेंज में मिड-पॉइंट के बारे में प्रश्न का जवाब था। मैं यही बताने की कोशिश कर रहा था। बाकी पॉइंट्स, डॉ. माइकल पात्रा विस्तृत में बताएंगे।
डॉ. माइकल डी. पात्रा:
धन्यवाद, गवर्नर। महंगाई के बारे में आपके प्रश्न के लिए, यदि आप एमपीसी का प्रस्ताव पढ़ें, तो उन्होंने महंगाई पर बहुत विश्लेषण किया है। और वे देखते हैं कि अगले दो महीनों में, उन्हें उम्मीद है कि महंगाई थोड़ी कम होगी, एक तो खरीफ की फसल आने के कारणों से से, और, दूसरा, सर्दियों में सब्जियों की कीमतों में आम नरमी के बारे में। और फिर गवर्नर अपने वक्तव्य में आगे कहते हैं कि ये दो घटनाएं आपूर्ति पक्ष प्रबंधन के लिए एक मौका देती हैं। यदि आपूर्ति पक्ष प्रबंधन समय पर और प्रभावदार हो, तो आप महंगाई का रास्ता पूरी तरह बदलते हुए देखेंगे। लेकिन, हमने आपको जो दिया है, वह आज की स्थिति के हिसाब से बेसलाइन है। लेकिन, यदि आप गवर्नर के मार्गदर्शन को पढ़ें, तो वह इस विंडो को आपूर्ति पक्ष प्रबंधन के लिए एक मौके के तौर पर देखते हैं, जो इस समय महंगाई का एक अलग रास्ता बनाने के लिए उपयोग करने का मुख्य माध्यम है।
योगेश दयाल:
अब मैं सीएनबीसी आवाज़ के श्री प्रदीप पंड्या से अपना प्रश्न पूछने का अनुरोध करूंगा।
प्रदीप पंड्या, सीएनबीसी आवाज़:
धन्यवाद, सर। गवर्नर, सर, मेरा प्रश्न एनबीएफसी के बारे में है। अपने वक्तव्य में आपने कहा था कि एनबीएफसी के फ्रेमवर्क की समीक्षा करने की ज़रूरत है। आपने कुछ और मुद्दों पर भी हमारा ध्यान खींचा। तो, आपके क्या विचार हैं? क्या आपको लगता है कि एनबीएफसी को अपनी पूंजी का अधिक उपयोग करने की ज़रूरत है, या वे ज़्यादा डिविडेंड दे रहे हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि आप इन मुद्दों की समीक्षा कर रहे हैं। और कुछ निवेशक और फंड मैनेजर आरबीआई के कुछ एनबीएफसी को बैंक में बदलने के बारे में सोचने की बात कर रहे हैं। तो, आपके क्या विचार हैं और इन संस्थाओं के लिए आप क्या रोडमैप देखते हैं?
शक्तिकांत दास:
पहला पॉइंट जो मैं रखना चाहूंगा, वह यह है कि आरबीआई की सोच यह है कि हम चाहते हैं कि एनबीएफसी क्षेत्र मज़बूत बना रहे। और जिस तरह से वे दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच के मामले में कार्य कर रहे हैं, वह प्रशंसनीय है। जहां बैंक कई बार नहीं पहुंच पाते, वहां एनबीएफसी उन कमियों को पूरा करते हैं। इसीलिए, हमने एनबीएफसी के लिए 'को-लेंडिंग' (सह-ऋण) की भी अनुमति दी है, और हाल ही में हमने को-लेंडिंग से जुड़ी नीति में कुछ बदलाव भी किए हैं। हमारी प्राथमिकता यह है कि एनबीएफसी क्षेत्र मज़बूत और सशक्त बना रहे, और अपना कार्य अच्छे से करता रहे। इसीलिए, इसके गवर्नेंस मॉडल, पूंजी से जुड़े मुद्दों और अन्य पहलुओं को और मज़बूत बनाने की ज़रूरत है। हमने पिछले डेढ़ वर्ष में कई कदम उठाए हैं। हमने एनबीएफसी के लिए चलनिधि अनुपात निर्धारित किया है, और यह अनिवार्य किया है कि एक मुख्य जोखिम अधिकारी नियुक्त किया जाए। अब, हम उनकी लाभांश नीति पर विचार कर रहे हैं, और उनके विनियामकिय ढांचे की समीक्षा कर रहे हैं, ताकि एक पैमाने पर आधारित विनियमन तैयार किया जा सके। एनबीएफसी क्षेत्र में, कुछ एनबीएफसी ऐसे हैं जिनकी कुल संपत्ति 20-25 करोड़ रुपये है; वहीं दूसरी ओर, कुछ बड़े एनबीएफसी भी हैं जिनकी संपत्ति 50,000 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा है। इसलिए, हम उनके लिए ज़्यादा बारीकी वाले या पैमाना आधारित विनियमन पर विचार कर रहे हैं। इस संबंध में डिस्कशन पेपर जारी होने वाला है, डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन मैट्रिक्स और विनियमन के लिए पैमाना आधरित मॉडल को सार्वजनिक डोमेन में रखा जाएगा, और आम जनता से इस पर सुझाव आमंत्रित करेंगे। मैंने बार-बार यह कहा है कि ये सभी संवेदनशील मामले हैं, और हम कोई भी एकतरफ़ा निर्णय नहीं लेंगे; बल्कि, हम बाज़ार से विचार विमर्श करेंगे, लोगों के सुझाव लेंगे, और उसके बाद ही कोई सोच-समझकर और ज़िम्मेदार निर्णय लेंगे। इस मामले में भी, हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल वैसा ही रहेगा। कृपया उन दोनों दस्तावेज़ों को पहले जारी हो जाने दें, और उसके बाद ही हम कोई अंतिम निर्णय लेंगे।
योगेश दयाल:
अब मैं '‘कोजेनसिस’' के बिजोय से अनुरोध करूंगा कि वे अपना प्रश्न पूछें।
टी. बिजोय इडिचेरियाह, ‘कोजेनसिस’:
मेरा एक छोटा सा प्रश्न 'एफ एक्स स्ट्रेटेजी' (विदेशी मुद्रा कार्यनीति) से जुड़ा है। क्या एफएक्स का प्रभाव, यानी विदेशी मुद्रा का भारी प्रवाह जो देश में आ रहा है, और इस बात का प्रभाव कि आप चलनिधि को कैसे संभाल रहे हैं - क्या यही उन कुछ समस्याओं के कारणों से बन रहा है जो हम अभी आपके लिए शॉर्ट-टर्म दरों में और भारत में आपकी चलनिधि प्रबंधन कार्यनीति में देख रहे हैं? लेकिन, बड़ा मुद्दा यह है - क्या मुद्रा का मज़बूत होना आपके लिए घरेलू अर्थव्यवस्था में कुछ शॉर्ट-टर्म रुकावटों से ज़्यादा बड़ी चिंता का विषय है?
शक्तिकांत दास:
यदि मैं आपके प्रश्न के सभी पहलुओं का जवाब दूँ, तो इससे हमारी आंतरिक कार्यनीति का खुलासा हो जाएगा। लेकिन, हमारी कार्यनीति, जैसा कि हमने बार-बार कहा है, यह है कि हम अस्थिरता को रोकें - इस नई अस्थिरता को - और यह सुनिश्चित करें कि विनिमय दर में एक व्यवस्थित बदलाव हो। आप सही कह रहे हैं, चलनिधि डालने की जो नीतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक ने 27 मार्च, 2020 से अपनाई हैं - जब हमने कोविड से निपटने के उपायों की घोषणाएँ शुरू की थीं - उसके बाद आरबीआई ने बाज़ार में जितनी भी चलनिधि डाली है, उसने अपना उदेश्य पूरा किया है। हमारा यही आकलन है। चाहे यह म्यूचुअल फंड क्षेत्र के संकट से जुड़ा हो - जो एक समय आया था, लेकिन जिसे काबू कर लिया गया - या फिर टीएलटीआरओ के माध्यम खास क्षेत्रों को दी गई सहायता हो। तो, आरबीआई द्वारा चलनिधि बढ़ाने के सभी उपायों ने अपने लक्ष्य हासिल किए हैं।
अब, वैश्विक हालात के कारणों से - जिनका उल्लेख मैंने आज अपने वक्तव्य में किया है - उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में, खासकर भारत में, बहुत ज़्यादा विदेशी मुद्रा का प्रवाह हो रहा है। हमें एफडीआई और एफपीआई, दोनों तरह का निवेश मिल रहा है; यदि मुझे ठीक से याद है, तो कुल एफडीआई प्रवाह लगभग 39.9 बिलियनअमेरिकी डालर रहा है। इसी तरह, एपपीआई का प्रवाह भी बहुत ज़्यादा है। हम इस समय 'रिवर्स रेपो' व्यवस्था के माध्यम इस प्रवाह के प्रभाव को बेप्रभाव (sterilise) कर रहे हैं। और, जैसा कि मैंने अपने वक्तव्य में बताया है, हमारे पास कई तरह के साधन हैं; हम लगातार बदलते हालात पर नज़र रख रहे हैं और सही समय आने पर हम इससे निपटेंगे।
बिजॉय:
सर, यदि आप बस एक बात स्पष्ट कर दें। इस बार की गाइडेंस में, आप सबने कहा है कि यह एकमत से हुआ। एमपीसी के सभी सदस्य इस बार एकमत थे, पिछली बार के विपरीत जब एक असहमति वाला विचार था।
शक्तिकांत दास:
मौद्रिक नीति वक्तव्य के सभी पहलू, मौद्रिक नीति प्रस्ताव के सभी पहलू, दर और रुख से जुड़े सभी पहलू, वे सभी एकमत से हैं।
योगेश दयाल:
धन्यवाद सर। मैं श्री रामकुमार से एक प्रश्न पूछने का अनुरोध करूँगा।
के. रामकुमार, हिंदु बिजनेस लाइन:
सर, बस यह जानना चाहता था कि, पिछले आठ महीनों में दो बैंकों को बचाना पड़ा है। तो, इस संदर्भ में, मैं बस यह जानना चाहता था कि क्या आरबीआई के पर्यवेक्षी तंत्र में कुछ कमी है और क्या आपको इसे गंभीरता से ठीक करने की ज़रूरत है?
शक्तिकांत दास:
मैंने यह बात पहले भी कई मौकों पर कही है। पिछले दो वर्षों में, हमने अपने पर्यवेक्षी प्रणाली को सचमुच मज़बूत और गहरा किया है। जिस तरह की गहन जाँच और विश्लेषण हम अब कर रहे हैं, जिस तरह की पर्यवेक्षण की जाँच हमने पिछले दो वर्षों में हासिल की है, वह पहले कभी नहीं हुई। और इन दो बैंकों की जो दो घटनाएँ हुईं, जिनमें हमें हस्तक्षेप कर समाधान करना पड़ा, ऐसा नहीं है कि वे अचानक एक सुबह हो गईं, और हमें पता ही नहीं था कि क्या हो रहा है। हमारा पहला ध्यान बैंक के प्रबंधन के साथ मिलकर कार्य करने और समस्या को हल करने पर होता है—उन्हें समझाना, उन्हें प्रेरित करना, उनसे अनुरोध करना। इसलिए हमारा पहला प्रयास हमेशा बैंकों के प्रबंधन के साथ मिलकर कार्य करना और समस्याओं को हल करना होता है। केवल तभी जब हमें विनियामकिय दखल की आवश्यकता दिखती है, केवल तभी जब हमें लगता है कि जमाकर्ताओं के सर्वोत्तम हित में विनियामकिय हस्तक्षेप ज़रूरी है, हम दखल देते हैं। पर्यवेक्षण में हमने जो सुधार किए हैं, उनके संबंध में, मैं उप गवर्नर, श्री एम. के. जैन से अनुरोध करूँगा कि वे बहुत संक्षेप में पर्यवेक्षण में सुधार और उसे मज़बूत करने के कुछ मुख्य बिंदुओं के बारे में बताएँ, जो हमने हाल के महीनों में किए हैं।
एम. के. जैन:
धन्यवाद, गवर्नर। जैसा कि गवर्नर ने बताया है, पिछले दो वर्षों में हमने पर्यवेक्षण को मज़बूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं, और ये ऐसे कदम थे जो पहले कभी नहीं उठाए गए थे। जैसे कि पर्यवेक्षण करने वाले विभागों का एकीकरण; हमने अप्रत्यक्ष निगरानी और निगरानी को मज़बूत करने का कार्य किया है; हमने एनालिटिक्स और आईटी के बड़े पैमाने पर उपयोग को मज़बूत किया है; पर्यवेक्षकों की स्किल को बेहतर बनाया है—ये सभी कदम उठाए गए हैं। यहाँ तक कि अलग-अलग संस्थाओं के आपसी जुड़ाव के मामले में भी, हमने एक खास टीम बनाई है, जो डेटा एनालिटिक्स और आईटी का उपयोग करके अप्रत्यक्ष विश्लेषण कर रही है।
योगेश दयाल:
धन्यवाद, सर। हमारा सत्र लगभग खत्म होने वाला है, लेकिन मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि आप दो-तीन प्रश्न और ले लें जो अभी भी बाकी हैं। तो आपकी अनुमति से, हम दो-तीन प्रश्न और लेंगे। तो मैं सबसे पहले रॉयटर्स की स्वाति भट से अनुरोध करता हूँ कि वे अपना प्रश्न पूछें।
स्वाति भट शेट्ये, रॉयटर्स:
नमस्कार, गवर्नर। मेरा बस एक प्रश्न था। वित्त मंत्री ने गुरुवार को संकेत दिया था कि अगले वर्ष हमारा बजट काफी विस्तारवादी हो सकता है, ताकि आर्थिक रिकवरी को सहारा दिया जा सके। क्या इस बात को ध्यान में रखा गया है कि इसका महंगाई के रुख पर क्या प्रभाव पड़ेगा, या आप अभी भी यह देखने का इंतज़ार कर रहे हैं कि यह सब कैसे आगे बढ़ता है? और दूसरी बात, क्या एफएक्स इंटरवेंशन (विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप) को संतुलित करने के लिए सिर्फ़ रिवर्स रेपो का ही उपयोग किया जाएगा? क्या निकट भविष्य में सिर्फ़ इसी तरीके का उपयोग होने की संभावना है? यदि आप इस बारे में कुछ स्पष्ट कर सकें। धन्यवाद।
शक्तिकांत दास:
जहाँ तक रिवर्स रेपो के एकमात्र तरीका होने की बात है, तो कृपया मेरे वक्तव्य को दोबारा देखें। मैंने कहा है कि आरबीआई के पास कई तरह के साधन मौजूद हैं, और इन साधनों का उपयोग सही समय पर किया जाएगा। आपके प्रश्न के पहले भाग के बारे में, जिसमें आपने वित्त मंत्री के वक्तव्य का उल्लेख किया है, मैं उस समय एमपीसी की बैठक में व्यस्त था। इसलिए, मैंने उनका पूरा वक्तव्य नहीं सुना है और न ही उसका पूरा लिखित रूप देखा है। लेकिन, जहाँ तक मुझे याद है—और जो कुछ मैंने मीडिया और अखबारों में पढ़ा है—उन्होंने कहा है कि यह एक विकास को बढ़ावा देने वाला बजट होगा; यह विकास-उन्मुख बजट होगा। मेरी जानकारी के अनुसार, मुझे नहीं लगता कि वित्त मंत्री ने 'विस्तारवादी बजट' शब्द का उपयोग किया है। मुझे लगता है कि उन्होंने कहा है कि यह एक विकास-उन्मुख बजट होगा। ज़ाहिर है, जब हम उस भारी नुकसान से उबरने की कोशिश कर रहे हैं जो महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पहुँचाया है, तो बजट का विकास-उन्मुख होना ज़रूरी है। और, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस वर्ष भी, सरकार ने जितने भी राजकोषीय उपाय घोषित किए हैं, वे सभी बहुत ही सोच-समझकर और सटीक तरीके से लागू किए गए हैं। और ये सभी बहुत ही समझदारी से तैयार किए गए हैं। असल में, महामारी की शुरुआत में यह चिंता थी कि सरकार का राजकोषीय घाटा पूरी तरह से बेकाबू हो जाएगा। खैर, ज़ाहिर है, राजकोषीय घाटा बढ़ा है, और इसे बढ़ना ही था। लेकिन मुझे लगता है कि सरकार की प्रतिक्रिया बहुत ही नपी-तुली, अच्छी तरह से सोची-समझी और समझदार रही है। इसलिए, अगले वर्ष का बजट भी, मुझे उम्मीद है कि सचमुच समझदारी भरा होगा, लेकिन स्वाभाविक रूप से, यह विकास-उन्मुख बजट होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है जो होनी ही है, इसमें कोई दो राय नहीं है। मेरा मतलब है, यह विकास को बढ़ावा देने वाला बजट होना चाहिए।
योगेश दयाल:
धन्यवाद, सर। मैं ब्लूमबर्ग के अनिर्बान नाग से अपना प्रश्न पूछने का अनुरोध करूँगा।
अनिर्बान नाग, ब्लूमबर्ग:
गवर्नर साहब, मेरे दो प्रश्न थे। पहला यह कि रुपये के अत्यधिक मूल्यांकन के बारे में कई विचार सामने आए हैं। क्या आपको लगता है कि इसका निर्यात पर प्रभाव पड़ेगा, खासकर तब, जब आपने आज सुबह ही कहा है कि निर्यात में सुधार काफी असमान रहा है? और दूसरी बात जो मैं आपसे पूछना चाहता था, वह आरबीआई द्वारा समीक्षा की जा रही मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण व्यवस्था (inflation targeting regime) के बारे में थी, जिसकी हमें 'मुद्रा और वित्त' रिपोर्ट में उम्मीद है। मेरा प्रश्न आपसे यह था कि क्या आरबीआई, सीपीआई के साथ-साथ डब्ल्यूपीआई को भी मुद्रास्फीति के एक आधार के रूप में शामिल करने पर विचार कर रहा है?
शक्तिकांत दास:
खैर, रिपोर्ट आने का इंतज़ार कीजिए। लेकिन, कम से कम हम डब्ल्यूपीआई एलिमेंट को शामिल करने पर विचार नहीं कर रहे हैं। यह आरबीआई के विचाराधीन नहीं है। और, वैसे भी, इसे कानून का हिस्सा होना चाहिए। मौजूदा कानून कहता है कि यह सीपीआई महंगाई है। नीति सीपीआई महंगाई पर आधारित है, महंगाई का लक्ष्य सीपीआई महंगाई पर आधारित है और आखिरी निर्णय सरकार और संसद लेगी। लेकिन यह कहने के बाद, मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरी समझ के अनुसार, मुझे सीपीआई से हटने जैसी कोई स्थिति नहीं दिखती, और आरबीआई के अंदर भी सीपीआई से डब्ल्यूपीआई पर जाने के बारे में ऐसी कोई सोच नहीं है, लेकिन कृपया विस्तृत रिपोर्ट आने का इंतज़ार कीजिए। और यदि आप चाहें, तो कृपया मुझे अपने प्रश्न के पहले भाग के बारे में याद दिला दें?
अनिर्बान:
यह सब रुपये के ओवरवैल्यूएशन के बारे में था।
शक्तिकांत दास:
रुपये के ओवरवैल्यूएशन या अंडरवैल्यूएशन के बारे में, जैसा कि आप जानते हैं, एक केंद्रीय बैंक के तौर पर, हम यह नहीं कह सकते कि यह ओवरवैल्यूड है या अंडरवैल्यूड और हम इसे किस स्तर पर देखना चाहते हैं। यह बात हमने पहले भी कई बार कही है। हमारा कोई लक्ष्य नहीं है, मैं आप में से कुछ लोगों को मुस्कुराते हुए देख सकता हूं। बाजार में रुपये की कीमत क्या होनी चाहिए, इस बारे में हमारा कोई खास लक्ष्य नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य बेवजह की अस्थिरता को रोकना है।
योगेश दयाल:
मैं आशीष अगाशे से अनुरोध करूंगा कि वे यहां आपसे आखिरी प्रश्न पूछें। इसके बाद, हमें इसे खत्म करना चाहिए।
आशीष अगाशे, पीटीआई:
बहुत-बहुत धन्यवाद सर। आपने सुबह पर्यवेक्षण को मज़बूत करने और इसे प्राथमिकता देने के बारे में बात की थी। सर, यह कल एचडीएफसी बैंक द्वारा किए गए उस खुलासे के बारे में था, जिसमें उन्हें सर्विस में रुकावटों के कारण जुर्माना देना पड़ा था। साथ ही, कल हमने यह भी देखा कि एसबीआई को भी कुछ हद तक रुकावटों का सामना करना पड़ा। आमतौर पर, बैंकों को अनुशासन में लाने के लिए हम पूरी तरह से मौद्रिक जुर्माने का रास्ता अपनाते थे। तो, क्या यह अनुशासन का कोई नया तरीका है, जिसे आपने अपनाया है और क्या इसका उपयोग कम ही किया जाएगा? या क्या हमें आगे चलकर ऐसे और मामले देखने को मिलेंगे?
शक्तिकांत दास:
निर्णय—चाहे वे मौद्रिक जुर्माना हों या पर्यवेक्षी कार्रवाई—हर मामले के हिसाब से अलग-अलग होते हैं, और मेरे लिए किसी एक मामले पर चर्चा करना सही नहीं होगा।
लेकिन, चूंकि ये दोनों मुद्दे मीडिया में काफी चर्चा में हैं, इसलिए मैं यह कहना चाहूंगा कि एचडीएफसी बैंक के मामले में, पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। साथ ही, डिजिटल भुगतान और इंटरनेट बैंकिंग के क्षेत्र में एचडीएफसी बैंक की मौजूदगी बहुत ज़्यादा है। इसलिए, हमें कुछ चिताएं थीं और कुछ कमियों वगैरह को लेकर भी हमारी नज़र थी। इसी वजह से हमें लगा कि यह ज़रूरी और आवश्यक है कि एचडीएफसी बैंक अपने विस्तार से पहले अपने आईटी प्रणाली को मज़बूत करे। इसीलिए, उन पर यह कारोबारी पाबंदी लगाई गई है। और मुझे पूरा यकीन है कि एचडीएफसी बैंक हमारी बताई गई सभी बातों का पालन करेगा; मुझे पक्का विश्वास है कि वे ऐसा करेंगे। इसी पृष्ठभूमि में यह निर्णय लिया गया था। देखिए, हम उन हज़ारों-लाखों ग्राहकों को घंटों तक किसी भी तरह की परेशानी में नहीं डाल सकते, जो डिजिटल बैंकिंग का उपयोग करते हैं। और, खासकर तब, जब हम खुद डिजिटल बैंकिंग पर इतना ज़ोर दे रहे हैं, तो डिजिटल बैंकिंग पर लोगों का भरोसा बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। और, हमें पूरा भरोसा है कि एचडीएफसी बैंक इस दिशा में ज़रूरी कदम उठाएगा; हमें इसी तरह के संकेत मिले हैं। एसबीआई के मामले में, यह घटना कल ही हुई है; हमारी टीमें इसकी जांच कर रही हैं। इसलिए, इस पर अभी कुछ भी कहना मेरे लिए जल्दबाज़ी होगी। लेकिन, एक आम बात के तौर पर, मैं यह कहना चाहूंगा कि सभी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को अपने आईटी प्रणाली और टेक्नोलॉजी में ज़्यादा निवेश करने की ज़रूरत है। यदि आप आने वाले वर्षों में प्रतिस्पर्धी बने रहना चाहते हैं, तो टेक्नोलॉजी ही इसकी कुंजी है; आपके आईटी प्रणाली का मज़बूत होना ही सबसे अहम है। इसलिए, बैंकों, एनबीएफसी और दूसरी वित्तीय संस्थाओं को अपने आईटी प्रणाली और टेक्नोलॉजी में ज़्यादा निवेश करना चाहिए, और अपने सभी प्रणाली को मज़बूत बनाना चाहिए, ताकि लोगों का भरोसा बना रहे। और यह एक ऐसी चीज़ है कि, आगे चलकर, पूरा वित्तीय क्षेत्र आईटी पर और भी ज़्यादा निर्भर होता जाएगा। इसलिए, सभी वित्तीय क्षेत्र की संस्थाओं को इन क्षेत्रों में और ज़्यादा निवेश करने की ज़रूरत है। तो, हमारी यही बातें हैं। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि हम विभिन्न बैंकों और एनबीएफसी के प्रबंधन के साथ लगातार संपर्क में हैं। जहाँ भी हमें उनके प्रणाली और प्रक्रियाओं में कमियाँ नज़र आती हैं, हम हमेशा उनके साथ आंतरिक तौर पर कार्य करने की कोशिश करते हैं और उन्हें अपने प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और सलाह देते हैं। हम ऐसा करना जारी रखेंगे। लेकिन कभी-कभी, कुछ खास स्थितियों में, कुछ कदम उठाना ज़रूरी और अनिवार्य हो जाता है। अब, एक विनियामक के तौर पर और देश में डिजिटल भुगतान क्षेत्र के संरक्षक के तौर पर, मुझे लगता है कि केंद्रीय बैंक को भी कदम उठाना होगा। और हमने ठीक यही किया है। धन्यवाद।
योगेश दयाल:
धन्यवाद, सर। इससे पहले कि हम इस सत्र को समाप्त करें, फिनांशियल एक्सप्रेस की श्रीतमा बोस की ओर से एक आखिरी प्रश्न का अनुरोध आया है।
श्रीतमा बोस, फिनांशियल एक्सप्रेस:
नमस्कार, सर। आपने आज कहा कि इस वर्ष संकटग्रस्त दो बैंकों की समस्या का समाधान किया गया, जिसमें जमाकर्ताओं के हितों को सबसे ज़्यादा प्राथमिकता दी गई। लेकिन, पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी बैंक) — जो एक वर्ष से भी ज़्यादा समय से प्रशासन के अधीन है और जिसके प्रशासक में भी बदलाव हो चुका है — उसके लिए अभी तक कोई समाधान नहीं निकला है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि उस खास बैंक की समस्या का समाधान करना इतना मुश्किल क्यों है, और उस बैंक के जमाकर्ता कब तक पूरी तरह से समाधान की उम्मीद कर सकते हैं? धन्यवाद।
शक्तिकांत दास:
देखिए, पीएमसी बैंक की स्थिति बिल्कुल अलग थी। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि पीएमसी बैंक ने ऐसे संभावित निवेशकों से 'एक्सप्रेशन ऑफ़ ब्याज' (ईओआई) आमंत्रित किया है, जो बैंक में निवेश करना चाहते हैं और उसका अधिग्रहण करना चाहते हैं। ईओआई और 'इन्फॉर्मेशन मेमोरेंडम' प्राप्त करने की आखिरी तारीख 30 नवंबर, 2020 थी, और इस समय प्रतिक्रिया काफी सकारात्मक लग रही है। ईओआई जमा करने की आखिरी तारीख 15 दिसंबर है। तो, आइए देखते हैं कि प्रतिक्रिया कैसी रहती है; उसके बाद ही हम इस मामले पर कोई निर्णय ले पाएंगे। बैंक और उसका प्रबंधन उन निवेशकों के साथ पूरी तरह से संपर्क में है, जिन्होंने 'इन्फॉर्मेशन मेमोरेंडम' खरीदा है।
योगेश दयाल:
धन्यवाद, सर। इसी के साथ, हम इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के समापन पर पहुँचते हैं। मैं गवर्नर साहब का विशेष रूप से धन्यवाद करना चाहूँगा कि उन्होंने आप सभी से मिलने की पहल की, भले ही हम इस समय लॉजिस्टिक्स और निजी जीवन, दोनों ही स्तरों पर कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए मैं आप सभी का भी मैं धन्यवाद करता हूँ। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को सफल बनाने में सहयोग देने के लिए सभी उप गवर्नरों का भी विशेष धन्यवाद। सुरक्षित रहें, बहुत-बहुत धन्यवाद।
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