22 अप्रैल 2026
मौद्रिक नीति समिति की 6 से 8 अप्रैल 2026 के दौरान हुई बैठक का कार्यवृत्त
[भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अंतर्गत]
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी के अंतर्गत गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की साठवीं बैठक 6 से 8 अप्रैल 2026 के दौरान आयोजित की गई थी।
2. बैठक की अध्यक्षता श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर ने की तथा सभी सदस्य – डॉ. नागेश कुमार, निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक, इंस्टिट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; श्री सौगत भट्टाचार्य, अर्थशास्त्री, मुंबई; प्रोफेसर राम सिंह, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली; डॉ. पूनम गुप्ता, मौद्रिक नीति की प्रभारी उप गवर्नर और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य, कार्यपालक निदेशक (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी(2)(सी) के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित रिज़र्व बैंक के अधिकारी) इसमें उपस्थित रहें।
3. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अनुसार, रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति समिति की प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन इस बैठक की कार्यवाहियों का कार्यवृत्त प्रकाशित करेगा, जिसमें निम्नलिखित शामिल होगा:
ए) मौद्रिक नीति समिति की बैठक में अपनाया गया संकल्प;
बी) मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वोट, जो उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर उस सदस्य द्वारा दिया जाएगा; और
सी) उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर धारा 45ज़ेडआई की उप-धारा (11) के अंतर्गत मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वक्तव्य।
4. वैश्विक और घरेलू मोर्चे पर हो रहे घटनाक्रमों को देखते हुए, एमपीसी ने स्टाफ के समष्टिआर्थिक अनुमानों की विस्तार से समीक्षा की, जिसमें सर्वेक्षण परिणामों और हितधारकों के साथ परामर्श से प्राप्त इनपुट शामिल थे। एमपीसी ने संभावना के विभिन्न जोखिमों से जुड़े वैकल्पिक परिदृश्यों की भी समीक्षा की। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए और मौद्रिक नीति के रुख पर विस्तृत चर्चा के बाद, एमपीसी ने संकल्प अपनाया जिसे नीचे प्रस्तुत किया गया है।
संकल्प
5. मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 60वीं बैठक 6 से 8 अप्रैल 2026 तक श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में आयोजित की गई। एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य बैठक में शामिल हुए।
6. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.00 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।
संवृद्धि और मुद्रास्फीति की संभावना
वैश्विक संभावना
7. पश्चिम एशिया में संघर्ष छिड़ने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारी रुकावट आई है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी हो गई है – कीमतें बढ़ गई हैं और वैश्विक संवृद्धि कम हो गई है। ऐसे माहौल में, मौद्रिक नीति के सामने एक मुश्किल दुविधा है – नीतिगत सख्ती करके मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं को नियंत्रित रखना, और साथ ही संवृद्धि पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को कम से कम रखना। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में लंबे समय तक राजकोषीय स्थिरता को लेकर चिंताओं के कारण सॉवरेन बॉन्ड प्रतिफल पहले से ही उच्च थे; अब मुद्रास्फीति के डर से वे और भी बढ़ गए हैं। इसके अलावा, इक्विटी मूल्यांकन (वैल्यूएशन) में भी सुधार देखने को मिला है। वैश्विक वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल के चलते, अमेरिकी डॉलर में तेज़ी आई है; 'सेफ हेवन' (सुरक्षित निवेश) की मांग से इसे बल मिला है, जिससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। संघर्ष का और अधिक तेज़ होना, इसका लंबे समय तक चलना और इसका भौगोलिक दायरा बढ़ना – ये सभी वैश्विक संभावना के लिए प्रमुख नकारात्मक जोखिम बने हुए हैं।
घरेलू संभावना
8. घरेलू स्थिति के संबंध में, भारतीय अर्थव्यवस्था 2025-26 में आघात-सह बना रहा। नए जीडीपी शृंखला (आधार वर्ष 2022-23) के दूसरे प्रारंभिक अनुमानों (एसएई) के अनुसार, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के वर्ष-दर-वर्ष 7.6 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। निजी उपभोग और स्थिर निवेश ने समग्र संवृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि निवल बाह्य मांग नरम बनी रही। आपूर्ति के संबंध में, अनुमानित वास्तविक जीवीए संवृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, जो उत्साहित सेवा क्षेत्र और मजबूत विनिर्माण गतिविधि से प्रेरित थी।
9. आगे चलकर, ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों के साथ-साथ स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में विघटन के कारण आपूर्ति आघात, 2026-27 में घरेलू उत्पादन पर एक बाधा के रूप में कार्य करेगा। वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता और इसके घरेलू वित्तीय परिस्थितियों पर प्रभाव- विस्तार, संवृद्धि की संभावनाओं पर दबाव डालेगा। बाह्य स्थिति के संबंध में, यदि संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो प्रमुख जहाज यात्रा मार्गों में विघटन और इसके साथ आने वाली माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि के कारण वस्तुओं के निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र में बने रहने वाली गति, जीएसटी सुधार का लगातार प्रभाव, विनिर्माण में बढ़ता क्षमता उपयोग, तथा वित्तीय संस्थानों और कॉर्पोरेट के स्वस्थ तुलन- पत्र को घरेलू मांग को समर्थन देते रहना चाहिए। इस परिदृश्य में, केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित कई कार्यनीतिक और अग्रणी क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ाने पर सरकार का ध्यान, भारत के आगामी संवृद्धि पथ के लिए शुभ संकेत है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए और यह मानते हुए कि संघर्ष का नकारात्मक प्रभाव आगे के समय तक सीमित रहेगा, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 6.9 प्रतिशत अनुमानित है, जिसमें पहली तिमाही में 6.8 प्रतिशत; दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 7.0 प्रतिशत; और चौथी तिमाही में 7.2 प्रतिशत (चार्ट 1) होगी। इसके अलावा, संघर्ष के आगे बढ़ने, इसके व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में जारी रहने और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे की क्षति के संबंध में अनिश्चितता, साथ ही मौसम से संबंधित घटनाओं के कारण घरेलू संवृद्धि की संभावना पर नकारात्मक जोखिम बना हुआ है।
10. नए सीपीआई शृंखला (2024=100) के अनुसार, फरवरी 2026 में हेडलाइन मुद्रास्फीति जनवरी के 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 3.2 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि मुख्य रूप से अनुकूल न होने वाले आधार प्रभावों के कारण हुई, भले ही गति निर्बल बनी रही। जबकि फरवरी में खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई, मूल (खाद्य और ईंधन को छोड़कर) मुद्रास्फीति यथावत् बनी रही। मूल्यवान धातुओं को छोड़कर, जनवरी और फरवरी में मूल मुद्रास्फीति 2.1 प्रतिशत पर मध्यम बनी रही, जो अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबावों की कमजोरी को सुझाती है।
11. चल रहे संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बड़ी अस्थिरता उत्पन्न की है, जिससे निकट अवधि की मुद्रास्फीति संभावना में काफी अनिश्चितता आई है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का प्रभाव चुनिंदा ईंधनों, जैसे प्रीमियम पेट्रोल, एलपीजी और औद्योगिक उपयोग के लिए डीजल, संबंधी कीमतों में वृद्धि के रूप में दिखाई दिया है। दूसरी ओर, मजबूत रबी फसल के कारण निकट अवधि में खाद्य आपूर्ति की संभावनाएं बढ़ी हैं, जिससे कुछ राहत मिली है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें पहली तिमाही में 4.0 प्रतिशत; दूसरी तिमाही में 4.4 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 5.2 प्रतिशत; और चौथी तिमाही में 4.7 प्रतिशत होगा। पश्चिम एशिया संघर्ष और संभावित एल नीनो की स्थितियों (जो दक्षिण-पश्चिम मानसून पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं) के कारण लगातार उच्च ऊर्जा कीमतें, मुद्रास्फीति पर ऊधर्वगामी जोखिम उत्पन्न करती हैं (चार्ट 2)। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, और मूल्यवान धातुओं को छोड़कर यह और भी कम है, जो यह संकेत देता है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नियंत्रित रहने की आशा है।

मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों का औचित्य
12. पिछली नीतिगत बैठक के बाद से, भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हेडलाइन मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और लक्ष्य से नीचे है, लेकिन मुद्रास्फीति संभावना के लिए ऊर्ध्वगामी जोखिम बढ़ गया है; इसका कारण ऊर्जा की कीमतों के दबाव में बढ़ोतरी और मौसम में संभावित गड़बड़ियां हैं, जो खाद्य मूल्यों को प्रभावित कर रहा है। मूल मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति शृंखला में रुकावटें और दूसरे दौर के प्रभाव (सेकंड-राउंड इफ़ेक्ट) का जोखिम, भविष्य में मुद्रास्फीति पथ को अनिश्चित बना देते हैं।
13. फरवरी 2026 तक के उच्चावृति संकेतक से पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों में मज़बूत गति बनी रहेगी। संवृद्धि के आवेग को मज़बूत निजी उपभोग और निवेश की मांग से लगातार समर्थन मिल रहा है। हालाँकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का संवृद्धि पर बुरा असर पड़ेगा। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि से जुड़ी अधिक इनपुट लागत, और साथ ही आपूर्ति शृंखला में रुकावटों के कारण डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए प्रमुख इनपुट की उपलब्धता सीमित हो सकती है, जिससे संवृद्धि बाधित होगी। सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने और आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कई कदम उठाए हैं, जिनसे इस संघर्ष के बुरे असर को कम करने में मदद मिलनी चाहिए।
14. एमपीसी ने यह पाया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की तीव्रता और अवधि, तथा इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचों को होने वाला नुकसान, मुद्रास्फीति और संवृद्धि की संभावनाओं के लिए जोखिम उत्पन्न करता है। हालाँकि, भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल आधार अब अधिक मज़बूत स्थिति में हैं, जिससे इसमें अतीत की तुलना में अब आघात- सहनीयता बढ़ ई है। अर्थव्यवस्था इस समय आपूर्ति आघातों का सामना कर रही है। बदलते हालात और उभरती संवृद्धि -मुद्रास्फीति संभावना पर नज़र रखते हुए इंतज़ार करना ही समझदारी है। तदनुसार, एमपीसी ने नीतिगत दरों को यथावत् रखने के पक्ष में वोट किया; साथ ही वह पूरी तरह सतर्क बनी हुई है, प्राप्त सूचनाओं पर बारीकी से नज़र रख रही है और जोखिमों के संतुलन का आकलन कर रही है। एमपीसी ने तटस्थ रुख को जारी रखने का भी निर्णय लिया, ताकि प्राप्त सूचनाओं के आधार पर विवेकपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया देने का सहूलियत बना रहे।
15. एमपीसी की बैठक के कार्यवृत्त 22 अप्रैल 2026 को प्रकाशित किए जाएंगे।
16. एमपीसी की अगली बैठक 3 से 5 जून 2026 के दौरान निर्धारित है।
नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने के संकल्प पर वोटिंग
| सदस्य |
वोट |
| डॉ. नागेश कुमार |
हाँ |
| श्री सौगत भट्टाचार्य |
हाँ |
| प्रो. राम सिंह |
हाँ |
| श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य |
हाँ |
| डॉ पूनम गुप्ता |
हाँ |
| श्री संजय मल्होत्रा |
हाँ |
डॉ. नागेश कुमार का वक्तव्य
17. अप्रैल 2026 की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक, वैश्विक अर्थव्यवस्था की आर्थिक संभावना को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाले मौजूदा पश्चिम-एशिया संघर्ष की पृष्ठभूमि में आयोजित हो रही है तथा इसका महत्वपूर्ण प्रभाव- विस्तार वर्ष 2026-27 की भारतीय अर्थव्यवस्था संभावना पर भी पड़ रहा है। फरवरी 2026 की एमपीसी बैठक के दौरान, भारतीय अर्थव्यवस्था संभावना काफी हद तक उज्ज्वल प्रतीत हो रही थी। सौम्य मुद्रास्फीति के बीच, लंबे समय से लंबित यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौता (एफ़टीए) वार्ताओं के 27 जनवरी को निष्कर्ष पर पहुंचने, फरवरी में अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर उच्च शुल्कों को वापस लेना तथा केंद्रीय बजट 2026-27 के प्रस्तावों के चलते यह उज्ज्वल संभावना बनी थी। भारतीय अर्थव्यवस्था के तथाकथित ‘गोल्डीलॉक्स’ चरण में लंबे समय तक बने रहने तथा 2025-26 में 7.6% की अनुमानित जीडीपी वृद्धि से निकट अवधि में लगभग 8% की उच्च वृद्धि प्राप्त करने की संभवना बनी हुई थी।
18. यद्यपि भारत की आर्थिक संवृद्धि के घरेलू इंजन—अर्थात् निजी उपभोग एवं निवेश तथा सरकारी उपभोग एवं पूंजीगत व्यय—सुदृढ़ बने हुए हैं और एल नीनो की संभावित स्थिति के कारण मानसून पर पड़ने वाले प्रभाव से कृषि क्षेत्र में कुछ चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं, तथापि पश्चिम-एशिया संघर्ष ने विभिन्न माध्यमों से भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। उक्त प्रभाव-विस्तार का प्रमुख कारण मध्य पूर्व से कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के आयात पर भारत की उच्च निर्भरता है। स्ट्रेट ऑफ होरमुज़ में अवरोध के कारण आपूर्ति बाधित हुई है और कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई है। कच्चे तेल की कीमतें भारत की आर्थिक संवृद्धि एवं मुद्रास्फीति संभावना को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक हैं। खाड़ी क्षेत्र भारत के निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य होने के साथ-साथ विप्रेषण का एक प्रमुख स्रोत भी है। समग्र आर्थिक रुझान भी प्रभावित हुआ है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने 2026 के लिए वैश्विक जीडीपी संवृद्धि अनुमान को 2025 के 3.3% से घटाकर 2.9% कर दिया है। बढ़ती तेल कीमतों, अल्पकालिक पूंजी बहिर्वाह और डॉलर के सुदृढ़ होने के संयुक्त प्रभाव के कारण रुपया दबाव में आया है।
19. कमज़ोर वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण निर्यात संवृद्धि प्रभावित हो रही है और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ रहा है। चालू खाता घाटा, जो अतीत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.5% के संतोषजनक स्तर पर बना हुआ था, अब बढ़ने की संभावना है। प्राकृतिक गैस की कमी ने उन अनेक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रभावित किया है जो इसे ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं। सरकार ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को सुगम बनाने हेतु कूटनीतिक प्रयास किए हैं तथा उत्पाद शुल्क में कमी कर खुदरा कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास किया है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह, अन्य बातों के साथ- साथ विशेष रूप से यूरोपीय देशों के साथ नए मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाते हुए, अपने आयात स्रोतों और निर्यात बाजारों का विविधीकरण करे। इसके लिए उत्पादन के मान और मानकों के अनुपालन को सुदृढ़ करते हुए, भारतीय उद्योग को यूरोपीय बाजारों विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र एवं परिधान, चमड़ा एवं जूता उद्योग, रत्न एवं आभूषण, तथा समुद्री उत्पाद में अपनी पैठ बढ़ाने हेतु तैयार करना होगा।
20. यह मानते हुए कि वर्ष भर कच्चे तेल की औसत कीमत 85 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहेगी, वित्त वर्ष 2027 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर का अनुमान 70 आधार अंकों की कमी के साथ वित्तीय वर्ष 2026 के अनुमानित 7.6% से घटाकर 6.9% किया गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, विनिमय दर में उतार-चढ़ाव तथा खाद्य कीमतों पर इनपुट लागत के संभावित प्रभावों सहित विभिन्न कारकों के संयुक्त प्रभाव से हेडलाइन मुद्रास्फीति वित्तीय वर्ष 2026 के 2.1% के निम्न स्तर से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2027 में 4.6% होने का अनुमान है। हालांकि, मुद्रास्फीति में यह भरी उछाल, स्पष्ट रूप से आपूर्ति-संबंधी आघातों का परिणाम है, न कि मांग-आधारित दबाव का।
21. अत्यधिक अनिश्चित मौजूदा आर्थिक परिवेश में, मौद्रिक नीति कार्रवाई में यथास्थिति बनाए रखना विवेकपूर्ण होगा। पश्चिम-एशिया की बदलती भू-राजनीतिक स्थिति और भारतीय अर्थव्यवस्था संभावना पर उसके प्रभावों पर सतत निगरानी रखना आवश्यक है। अतः, मैं रेपो दर को यथावत बनाए रखने तथा तटस्थ रुख जारी रखने के पक्ष में अपना वोट देता हूँ।
श्री सौगत भट्टाचार्य का वक्तव्य
22. फरवरी 2026 के अपने वक्तव्य में, मैंने न केवल उच्चतर मुद्रास्फीति पूर्वानुमान का उल्लेख किया था, बल्कि मुद्रास्फीतिजन्य दबावों के संचय के जोखिम की ओर भी संकेत किया था। इसके अतिरिक्त, आधार संशोधनों के पश्चात नई आर्थिक आँकड़ा शृंखलाओं के आगामी प्रकाशन से ऐसे संकेत मिलने की उम्मीद थी, जो वर्तमान आर्थिक परिवेश को अधिक यथार्थ रूप में प्रतिबिंबित करें। अतः, मैंने यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में वोट किया था।
23. दो माह पश्चात, अप्रैल 2026 में, पश्चिम-एशिया में संघर्ष तथा उससे जुड़े भू-राजनीतिक प्रभावों के कारण जोखिमों का संतुलन उल्लेखनीय रूप से बदल गया है। परिणामस्वरूप, इस समय भारत में संवृद्धि–मुद्रास्फीति के मध्य संतुलन होना, जो मेरे निर्णय का प्रमुख आधार है, निम्नलिखित कारणों से अनिश्चित बना हुआ है।
1. पश्चिम-एशिया संघर्ष विराम के अनंतिम संकेतों और, इस क्रम में, बाधित वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के सामान्य हो जाने के बावजूद, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में लगातार संधि-भंग होने संबंधी अनिश्चितताएँ अभी भी बढ़ी हुई हैं।
2. निकट भविष्य, यहाँ तक की मध्यम अवधि, में भी ऊर्जा कीमतों के संघर्ष-पूर्व की कीमतों के स्तर पर पहुँचने की संभावना बहुत कम है। गत कुछ वर्षों में आपूर्ति शृंखला बार-बार बाधित हुई है जिसके कारण उत्पादन लागत में वृद्धि हुई है। इस प्रकार के व्यवधानों के जारी रहने से आकस्मिक एवं असंगत वृद्धि रूपी समष्टि-आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
3. संवृद्धि के संदर्भ में, मौजूदा उच्च आवृत्ति संकेतकों में मार्च के दौरान आर्थिक गतिवधि सतत रूप से आघात-सह बनी रही, यद्यपि “नावकास्ट” मेट्रिक्स, मंदी के संकेत दे रहे हैं। वर्ष 2026 की आगामी चौथी तिमाही में कंपनियों के परिणाम घोषित होंगे जिनसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों की अद्यतित स्थिति का पता चलेगा और इसके परिणामस्वरूप अपेक्षाकृत लघु उद्यमों की आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रभाव लक्षित होगा।
4. मुद्रास्फीति के संदर्भ में, हमने कुछ निजी मौसम विज्ञान संगठनों द्वारा अत्यधिक गर्मी और अल नीनो की संभावित शुरुआत के आसार संबंधी प्रारंभिक पूर्वानुमानों को संज्ञान में लिया है। इनके कारण मौजूदा आपूर्ति आघातों में वृद्धि हो सकती है।
5. अधिक चिंता का विषय यह है कि मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं ने मुद्रास्फीति बढ़ने का संकेत किया है। मार्च 2026 के आरबीआई पारिवारिक मुद्रास्फीति प्रत्याशा संबंधी सर्वेक्षण में एक वर्ष आगे के लिए अपेक्षाकृत स्थिर मुद्रास्फीति की प्रत्याशा है लेकिन 3 महीने आगे की उक्त प्रत्याशा 60 आधार अंकों तक तेज़ी से बढ़ी है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवारों में वार्षिक मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान 50 आधार अंकों तक बढ़ गए हैं। आईआईएम अहमदाबाद बिजनेस इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस सर्वे (बीआईईएस) द्वारा एक वर्ष आगे की मुद्रास्फीति में बहुत तेज़ वृद्धि दिखाई गई है।
6. मौजूदा अनिश्चितता को देखते हुए, संवृद्धि और मुद्रास्फीति के मात्रात्मक पूर्वानुमान, हालांकि मार्गदर्शन के लिए उपयोगी तो हैं लेकिन नीतिगत निर्णयों की सूचना देने में सीमित रूप से ही उपयोगी है।
7. भारत के भुगतान संतुलन और व्यापार पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। घरेलू उत्पादन में व्यवधान और लोजिस्टिक्स संबंधी बाधाओं से पण्य निर्यात पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। प्रौद्योगिकी पर विवेकाधीन व्यय में कटौती के कारण आईटी सेवाओं के व्यापार पर भी असर पड़ सकता है। खाड़ी देशों से आने वाला विप्रेषण भी संकटग्रस्त हो सकता है।
8. पूंजी खाता वैश्विक भू-आर्थिक गतिविधियों के प्रति संभावित रूप से भेद्य बना हुआ है। बढ़ती वैश्विक मुद्रास्फीति के दबाव के कारण प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों के लिए दरों को बढ़ाने की गुंजाइश कम हो गई है, जिससे भारत में पूंजी प्रवाह पर प्रभाव- विस्तार की संभावना है।
9. इनके अलावा, अमेरिका की अव्यवस्थित टैरिफ अधिसूचनाओं जनित प्रभाव और विभिन्न द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के परिणामों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
10. पिछली घटनाओं के विश्लेषण से यह पता चलता है कि तेल-कीमतों संबंधी आघातों, चाहे वे स्वतंत्र हों अथवा युद्ध-जनित, से निपटने का कोई मानक तरीका उपलब्ध नहीं है।1
24. जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि मौद्रिक नीति ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित नहीं कर सकती है, लेकिन आर्थिक समायोजन की प्रक्रिया को इस तरह से सुगम बना सकती है कि मुद्रास्फीति के लक्ष्यों को संधारणीय रूप से प्राप्त किया जा सके।
25. मेरे अनुसार, इस अनिश्चितता के बीच नीतिगत गलती के जोखिम बढ़ गए हैं। उच्च मुद्रास्फीति की आशंका में नीतिगत दर बढ़ाने के तर्क उतने ही जोखिम भरे हैं जितने कि कम संवृद्धि के डर से दरों में कटौती करना। एक सटीक समय-सीमा के साथ संचरण पथ निर्धारित करना एक सटीक विज्ञान नहीं है। चुनौती यह निर्धारित करना है कि अर्थव्यवस्था में आने वाले आघात क्षणिक हैं अथवा सतत रूप से आ रहे हैं, तथा मुद्रास्फीति और संवृद्धि दोनों के लक्ष्यों पर वापस आने में कितना समय लगने की आशा है।
26. मैं घरेलू वित्तीय स्थितियों के बाधित होने को भी ध्यान में रख रहा हूँ, जो वास्तविक रूप से मौद्रिक नीति के कठोर होने के बराबर है। अतः इस समय यथास्थिति बनाए रखना सबसे सही विकल्प होना चाहिए। अतएव मैं इस बैठक में रेपो दर को अपरिवर्तित रखने के लिए वोट करता हूँ। समष्टि-आर्थिक गतिविधियों के संचरण को देखते हुए, तटस्थ रुख को बनाए रखना उचित भी है।
प्रो. राम सिंह का वक्तव्य
27. पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण, भारत की आर्थिक संवृद्धि और मुद्रस्फीति के बीच का संतुलन (ट्रेड-ऑफ) फरवरी 2026 तक 'गोल्डीलॉक्स' स्थिति (कम महंगाई और तेज़ आर्थिक संवृद्धि) से बदलकर बिल्कुल विपरीत स्थिति में पहुँच सकता है। ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में 40% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है; मार्च की शुरुआत में जहाँ इसकी कीमत लगभग 76–77 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं महीने के अंत तक यह 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई, और तो और, कुछ समय के लिए तो यह 110 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई थी। परिणामस्वरूप, पिछले महीने में समष्टि-आर्थिक वातावरण में काफी परिवर्तन हुआ है। आज, 'संवृद्धि-मुद्रास्फीति-जोखिम' त्रय - आर्थिक संवृद्धि को संतुलित करना, मुद्रास्फीति के दबावों को नियंत्रित करना, और साथ ही इससे जुड़े जोखिमों को संभालना- भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक असामान्य चुनौती प्रस्तुत करता है।
28. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में चल रही उथल-पुथल, तेल की आपूर्ति में व्यावधान और मांग पर उनके असर के ज़रिए सीधे तौर पर आर्थिक संवृद्धि की गति को धीमा कर रही है। इसके साथ-साथ, प्रमुख शिपिंग लाइनों में आई रुकावटों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय निर्यात के संवृद्धि की संभावनाओं को भी कमज़ोर कर दिया है। अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि का अनुमान पहली तिमाही में 6.8 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 7.0 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 7.2 प्रतिशत है। 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन जैसे-जैसे यह संघर्ष जारी रहेगा, संवृद्धि दर में गिरावट का जोखिम भी बढ़ता जाएगा। मेरे आकलन के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण, फिलहाल संवृद्धि दर का यह अनुमान 50-60 आधार अंक कम हो गया है।
29. इसके विपरीत, मुद्रास्फीति के अनुमान को ऊर्ध्वगामी संशोधित किया जा रहा है। संघर्ष के कारण आपूर्ति में आई व्यावधानों और इसके परिणामस्वरूप माल ढुलाई और बीमा लागतों में हुई भारी बढ़ोतरी के कारण, वैश्विक ऊर्जा और अन्य पण्यों की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ गई, और उर्वरकों की कीमतों ने मूल मुद्रास्फीति पर दबाव और बढ़ा दिया। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए, सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6 प्रतिशत लगाया गया है, जोकि पहली तिमाही के लिए 4.0 प्रतिशत; दूसरी तिमाही के लिए 4.4 प्रतिशत; तीसरी तिमाही के लिए 5.2 प्रतिशत; और चौथी तिमाही के लिए 4.7 प्रतिशत रहना अनुमानित है। मौसम से जुड़ी घटनाएँ - जैसे अल नीनो के कारण होने वाली गड़बड़ियाँ - घरेलू संवृद्धि की संभावना के लिए अधोगामी जोखिम उत्पन्न करती हैं, जबकि मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्र के लिए अधोगामी जोखिम उत्पन्न करती हैं।
30. हालांकि पश्चिम एशिया के संघर्ष और अल नीनो से उत्पन्न विघ्न का संवृद्धि और मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले असर की दिशा तो स्पष्ट है, लेकिन इस असर की मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितने समय तक चलता है। संवृद्धि और मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले कुल असर काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगे कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है। यदि इसका शीघ्र समाधान हो जाता है, और साथ ही पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के असर को सीमित करने के लिए राजकोषीय और प्रशासनिक उपाय किए जाते हैं, तो मुद्रास्फीति का दबाव तेज़ी से कम होकर ऐसे स्तर पर आ सकता है जिसे आसानी से प्रबंधित किया जा सके।
31. बढ़ोतरी के बावजूद, मुद्रास्फीति प्रक्षेप पथ इस समय सहन-सीमा बैंड के भीतर ही है। वर्ष 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति दर 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, और यदि हम कीमती धातुओं को हटा दें, तो यह और भी कम होगी। खुदरा पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी की कीमत पर प्रशासनिक नियंत्रण के कारण, कच्चे तेल की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी से उत्पन्न होने वाली मुद्रास्फीति का असर, अचानक तेज़ी से बढ़ने और फिर धीरे-धीरे कम होने वाला नहीं होगा, बल्कि यह धीरे-धीरे और मध्यम गति से बढ़ेगा। जलाशयों में पानी के उच्च स्तर और खाद्य पदार्थों का पर्याप्त भंडार, अल नीनो से उत्पन्न विघ्न के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद करेगा।
32. इस पृष्ठभूमि में, सौम्य रुख़ वाले विराम की गुंजाइश बनती है। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण अब तक संवृद्धि पर पड़ने वाली अनुमानित लागत लगभग 50-60 बीपीएस मानी जा रही है, जिससे उत्पादन अंतराल और बढ़ गया है। अंतर्निहित मुद्रास्फीति, अर्थात् कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति, यह संकेत देती है कि आने वाली तिमाहियों में मांग का दबाव नियंत्रित रहने की उम्मीद है। दूसरी ओर, ऊर्जा की कीमतों में उछाल और आपूर्ति-पक्ष में आई व्यवधानों के कारण बढ़ी हुई इनपुट लागत ने एमएसएमई क्षेत्र को असमान रूप से प्रभावित किया है; इस क्षेत्र के पास इन आघातों से उबरने के लिए पर्याप्त कार्यशील पूंजी उपलब्ध नहीं है। रेपो दर में एक सौम्य रुख़ वाले विराम, साथ ही पर्याप्त राजकोषीय उपायों से, इन फर्मों को इस आघात से निपटने में मदद मिल सकती है। अतः, मैं चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ़) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर ही बनाए रखने के पक्ष में वोट करता हूँ।
33. यह सच है कि बाह्य स्तर पर एक सौम्य रुख वाला विराम (डोविश पौस) कोई विशेष मदद नहीं करेगा, विशेषकर तब जब आईएनआर का अवमूल्यन हो रहा हो और चालू खाता घाटे (सीएडी) के आंकड़े मिले-जुले संकेत दे रहे हों। आने वाले महीनों में, कच्चे तेल और कीमती धातुओं की ऊंची कीमतों के कारण सीएडी पर और भी अधिक दबाव पड़ने की संभावना है। हालांकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने इन दोनों मामलों में तात्कालिक अस्थिरता बढ़ा दी है, लेकिन इन समस्याओं का लगातार बने रहना अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद ढांचागत चुनौतियों को दर्शाता है, जैसे कि विदेशी ऊर्जा स्रोतों और अन्य महत्वपूर्ण आपूर्तियों पर अत्यधिक निर्भरता। इन समस्याओं का समाधान एक अलग स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है। अल्पावधि में, प्रशासनिक और विनियामकीय उपाय भी सीएडी और आईएनआर से जुड़े घटनाक्रमों को नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
34. इस समय समान्यतः, बाह्य स्तर पर और विशेष रूप से पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर अनिश्चितता का स्तर काफी ऊँचा है। ऐसा लगता है कि कई ऐसी अज्ञात बातें हैं जिनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को मापना संभव नहीं है। इन परिस्थितियों में, मौद्रिक नीति का डेटा-आधारित होना और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित करना ही समझदारी भरा कदम प्रतीत होता है। ऐसा इसलिए ताकि, यदि कोई अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो रेपो दर को किसी भी दिशा में बदलने के लिए पर्याप्त गुंजाइश बनी रहे।
35. अतः, मैं मौद्रिक नीति के रुख पर अपना मत ‘निभावकारी’ से बदलकर ‘तटस्थ’ कर रहा हूँ।
श्री इंद्रनील भट्टाचार्य का वक्तव्य
36. वैश्विक आर्थिक संभावना, जो फरवरी की एमपीसी बैठक तक काफी मज़बूत था, पश्चिम एशिया में संघर्ष छिड़ने के बाद काफ़ी बिगड़ गया है। इसके परिणामस्वरूप लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में आई रुकावट ने न केवल अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है, बल्कि इसने वैश्विक व्यापार प्रवाह को भी बाधित कर दिया है—विशेष रूप से उस व्यापार को जो 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' से होकर गुज़रता है, जिससे भारत के लगभग आधे ऊर्जा आयात की पूर्ति होती है। हालाँकि, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस संघर्ष का समष्टि-आर्थिक प्रभाव, इसकी अवधि, मान और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के सामान्य होने की बाद की गति और समय-सीमा पर निर्भर करेगा।
37. भारतीय संदर्भ में, कृषि क्षेत्र की संभावनाएं अनुकूल बनी हुई हैं, हालांकि संभावित अल नीनो स्थितियों के कारण इनमें कुछ कमी आ सकती है। हालांकि, कारोबारी मनोभाव यह संकेत देती है कि विनिर्माण और सेवा, दोनों ही क्षेत्रों में आघात-सहनीयता बनी रहेगी। यद्यपि आपूर्ति में बाधाओं के कारण डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए इनपुट की उपलब्धता सीमित हो जाती है, लेकिन सरकार ने आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित रखने और तनाव को कम करने के लिए कई उपाय किए हैं। मांग के स्तर पर, निजी उपभोग के मज़बूत बने रहने की आशा है, जबकि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर लगातार व्यय से निवेश गतिविधियों को सहारा मिलेगा। हालांकि, वैश्विक मांग में सुस्ती और लदान तथा माल ढुलाई की ऊंची लागत के कारण माल निर्यात पर दबाव पड़ सकता है, लेकिन सेवा निर्यात के मज़बूत बने रहने की आशा है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वास्तविक जीडीपी संवृद्धि दर के 2025-26 में 7.6 प्रतिशत से घटकर 2026-27 में 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
38. नई सीपीआई शृंखला के आधार पर, 2026 के पहले दो महीनों में हेडलाइन मुद्रास्फीति दर निर्धारित लक्ष्य के दायरे में ही रही, जबकि मूल मुद्रास्फीति दर भी नियंत्रित रही। हालाँकि, 2026-27 के लिए, संघर्ष के कारण मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ गया है, जिससे कीमतें बहुत ज़्यादा अस्थिर हो गई हैं और भू-राजनीतिक खबरों के प्रति बेहद संवेदनशील हो गई हैं। हालाँकि, घरेलू मुद्रास्फीति पर ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों का प्रभाव अब तक कम ही रहा है, क्योंकि खुदरा ईंधन की कीमतें यथावत् हैं, लेकिन इनपुट लागत में बढ़ोतरी से आगे चलकर कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। खाद्य मुद्रास्फीति की संभावना संतोषजनक बनी हुई है, हालाँकि अल नीनो के कारण मौसम में होने वाले बदलाव एक बड़ा जोखिम बने हुए हैं। इनपुट लागत के दबाव के प्रभाव के कारण मूल मुद्रास्फीति में भी बढ़ोतरी होने की आशा है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 में वार्षिक औसत मुद्रास्फीति दर 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो 2025-26 में दर्ज की गई 2.1 प्रतिशत की दर से ज़्यादा है।
39. संघर्ष के कारण, मौद्रिक नीति को आपूर्ति आघात का सामना करना पड़ रहा है, जोकि मुद्रास्फीति के लिए ऊर्ध्वगामी जोखिम और आर्थिक संवृद्धि के लिए अधोगामी जोखिम उत्पन्न करती है; जैसा कि एमपीसी के संकल्प में दिए गए असममित फैन चार्ट में दर्शाया गया है। इस संदर्भ में, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति के लिए एक ऐसी नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है, जो मांग-जनित मुद्रास्फीति की प्रतिक्रिया से बिल्कुल अलग हो।2 आपूर्ति के कारण उत्पन्न होने वाले मुद्रास्फीति आघात के सीधे प्रभाव को कम करने की मौद्रिक नीति की क्षमता सीमित होती है; इसका वास्तविक प्रभाव तब दिखता है, जब दूसरे दौर के प्रभाव सामने आते हैं। ये प्रभाव बढ़ती कीमतों और मज़दूरी के रूप में तब दिखाई देते हैं, जब मुद्रास्फीति अनियंत्रित हो जाती हैं, जो कि अभी नहीं दिख रहा है। यह होगा या नहीं, और किस सीमा तक होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संघर्ष कितने समय तक चलता है, कितने इलाके में फैलता है, और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। जब तक अपेक्षाएँ नियंत्रित रहती हैं, तब तक इस आघात को नज़रअंदाज़ करना ही सबसे सही तरीका है, क्योंकि कोई भी पूर्व निर्धारित प्रतिक्रिया केवल उत्पादन को नुकसान पहुँचाता है, और मुद्रास्फीति स्तर पर इसका कोई विशेष लाभ नहीं होता।3 अतः, कोई भी निश्चित कार्रवाई करने से पहले, और अधिक जानकारी प्राप्त होने की प्रतीक्षा करना ही समझदारी है। तदनुसार, मैं तटस्थ रुख बनाए रखते हुए, नीतिगत दर यथावत रखने के पक्ष में वोट देता हूँ।
डॉ पूनम गुप्ता का वक्तव्य
40. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था, विश्व की कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ, कई बाहरी झटकों के अधीन रही है। इनमें 2020 में कोविड; 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध; और 2025 में अमेरिका द्वारा एकपक्षीय प्रशुल्क की कठोर दर शामिल थी। जब ये झटके थोड़े कम होने लगे थे, तभी पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्थाओं को उल्लेखनीय तीव्रता से प्रभावित किया।
41. मौजूदा नीतिगत ढांचों और समय पर नीतिगत कार्रवाइयों के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था ने अतीत के सभी झटकों को सफलतापूर्वक पार किया है। और वही कारक वर्तमान झटके के समय भी सहायक सिद्ध होंगे।
42. पिछले कुछ महीनों में एक महत्वपूर्ण गतिविधि, नई सीपीआई और जीडीपी शृंखलाओं का प्रकाशन रही है। दोनों शृंखलाओं का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के बाद, हम मानते हैं कि संशोधित शृंखलाएं अधिक स्थिर आंकड़े प्रदान करेंगी, जिससे जीडीपी शृंखला में कम महत्वपूर्ण संशोधनों की आवश्यकता होगी; और मुद्रास्फीति के आंकड़े कम अस्थिर और अधिक सटीक होंगे।
43. नई शृंखला का उपयोग करते हुए तथा राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर चल रही गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए, हमने वर्ष 2026-27 के लिए अपने पूर्वानुमान तैयार किए हैं, जिनमें तिमाही पथ भी शामिल है। ये संकेत देते हैं कि 2026-27 में मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन सहन- सीमा के भीतर ही रहेगी। मुद्रास्फीति में प्रक्षेपित वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा आधार प्रभाव और उच्च तेल मूल्यों के कारण है। जब हेडलाइन मुद्रास्फीति से खाद्य, ईंधन और अस्थिर मूल्यवान धातुओं को निकाल दिया जाता है, तो प्रक्षेपित मुद्रास्फीति अधिक सौम्य होती है।
44. वर्ष 2026-27 के लिए संवृद्धि थोड़ी कम, 6.9 प्रतिशत के स्तर पर अनुमानित है। वर्तमान क्षमता उपयोग दर तथा यह तथ्य कि पिछले वर्षों की उच्च संवृद्धि ने सौम्य मुद्रास्फीति के साथ संगतता दिखाई है, इस बात का संकेत देता है कि भारत की संवृद्धि सुधरती मूलभूत स्थितियों द्वारा संचालित हुई है। सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों में स्वस्थ निवेश दरें इस बात की ओर संकेत करती हैं कि जबकि मौजूदा क्षमता का अच्छी तरह से उपयोग किया जा रहा है, नई क्षमता का निर्माण भी हो रहा है।
45. वर्तमान परिस्थितियों में, जब वैश्विक अनिश्चितता पहले से ही उच्च स्तर से और बढ़ गई है; बाह्य झटका आपूर्ति-चालित है; मुद्रास्फीति, हालांकि बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन लक्ष्य के निकट बनी रहने की संभावना है; और संवृद्धि कमजोर रहने की उम्मीद है, तो मौद्रिक नीति की भूमिका क्या होनी चाहिए? मेरा मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में, केंद्रीय बैंकों को अर्थव्यवस्था की उत्पादक आवश्यकताओं का समर्थन करने में सहायक भूमिका निभाते रहना चाहिए। आपूर्ति झटके की स्थायित्व की पुष्टि करने के लिए प्रतीक्षा करते समय निरंतर सतर्कता आवश्यक है।
46. अतः, मैं स्थिति को अपरिवर्तित रखने के पक्ष में मत देता हूँ, अर्थात् नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा जाए। मैं यह भी सुझाव देता हूँ कि दृष्टिकोण को न्यूट्रल पर बनाए रखा जाए, अर्थात् नीति कार्रवाई का भविष्य का पाठ्यक्रम आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए।
श्री संजय मल्होत्रा का वक्तव्य
47. वर्ष 2025-26 में, अच्छे उपभोग एवं निवेश मांग द्वारा संचालित तथा अनुकूल वित्तीय परिस्थितियों एवं निभावकारी नीतियों की सहायता से, देश में वास्तविक आर्थिक गतिविधि मजबूत बनी रही।
48. पश्चिम एशिया का संघर्ष, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई माध्यमों से चुनौतियाँ उत्पन्न करता है - निर्यात, महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति, ऊर्जा एवं अन्य वस्तुओं के उच्च मूल्य, विप्रेषण, अनिश्चितता, निम्न वैश्विक मांग आदि। इन चुनौतियों के बावजूद, 2026-27 के लिए संभावना, सावधानीपूर्वक सकारात्मक बनी हुई है, जिसमें सेवा क्षेत्र, कृषि एवं स्वस्थ तुलन- पत्र संवृद्धि को समर्थन प्रदान करते रहेंगे। निजी उपभोग एवं निवेश आघात- सह बने रहने की उम्मीद है, जिसे बढ़ती ग्रामीण मांग, निरंतर सार्वजनिक व्यय एवं निजी पूंजीगत व्यय में वृद्धि से सहायता मिलेगी। लॉजिस्टिक्स में बाधाओं, बढ़ती ढुलाई और बीमा लागत से पण्य निर्यात प्रभावित होने की संभावना है। दूसरी ओर, निम्न वैश्विक मांग के बावजूद, सेवा निर्यात और हाल के व्यापार करारों से समर्थन मिलने की आशा है। हालांकि 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन वैश्विक और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण इसमें गिरावट का जोखिम बना हुआ है।
49. मुद्रास्फीति के संदर्भ में, 2026 के पहले दो माह में हेडलाइन मुद्रास्फीति लक्ष्य के भीतर ही बनी रही। जबकि खाद्य मुद्रास्फीति पिछले चार महीनों तक अपस्फीति में रहने के बाद बढ़ी, ईंधन मुद्रास्फीति मध्यम स्तर पर रही। मुख्य मुद्रास्फीति के विभिन्न मापदंड भी अनुकूल बने रहे, जिससे यह संकेत मिलता है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नियंत्रित बने हुए हैं।
50. मुद्रास्फीति के लिए संभावना के संदर्भ में, अब तक पेट्रोल और डीजल के खुदरा मूल्य अपरिवर्तित बने हुए हैं तथा खाद्य मूल्यों के लिए सन्निकट संभावना अनुकूल बनी हुई है। हालांकि 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, बढ़ती वैश्विक ऊर्जा कीमतें, उच्च आदान लागत और एल नीनो की स्थिति बनने की संभावना से उद्धर्वगामी जोखिम बना हुआ है।
51. समग्र रूप से, पिछले एक महीने में संघर्ष के विस्तार के साथ भू-राजनीतिक अनिश्चितताएँ बढ़ गई हैं। इसके परिणामस्वरूप, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जो पूरी तरह से शांत होने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बहाल करने में अधिक समय ले सकते हैं, संवृद्धि के लिए अधोगामी जोखिम और मुद्रास्फीति के लिए उद्धर्वगामी जोखिम बना हुआ है। तथापि, इन झटकों का सामना करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय पहले के किसी भी दौर की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत स्थिति में है।
52. मौद्रिक नीति के संदर्भ में, यह एक आपूर्ति झटका प्रस्तुत करता है। झटके के बिना, अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नियंत्रित हैं। यदि संघर्ष लंबे समय तक अनिर्णित रहता है, तो यह केंद्रीय बैंकों के लिए चुनौतीपूर्ण बन सकता है कि वे मुद्रास्फीति की प्रत्याशाओं को नियंत्रित करें जबकि संवृद्धि को न्यूनतम रखें। हालाँकि, अस्थायी संघर्ष विराम की घोषणा के साथ, संघर्ष के शीघ्र समाधान और आपूर्ति श्रृंखला के सामान्यीकरण की संभावना है। ऐसी स्थिति में, कोई भी निर्णायक कदम उठाने से पहले, इंतज़ार करना और स्थिति पर नज़र रखना समझदारी है।
53. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, मैं मौद्रिक दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने तथा तटस्थ रुख को बनाए रखने के पक्ष में वोट करता हूँ। आगे बढ़ते हुए, सतर्क और चौकस रहने की आवश्यकता है; आने वाली सभी जानकारियों पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए, ताकि व्यापक अर्थव्यवस्था पर उनके प्रभाव को समझा जा सके।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/121
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