5 जून 2026
मौद्रिक नीति वकतव्य, 2026-27
मौद्रिक नीति समिति का संकल्प
3 से 5 जून, 2026
मौद्रिक नीति निर्णय
मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 61वीं बैठक 3 से 5 जून 2026 तक श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में आयोजित की गई। एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य बैठक में शामिल हुए।
2. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.00 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।
संवृद्धि और मुद्रास्फीति की संभावना
वैश्विक संभावना
3. पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष लंबे समय तक जारी रहने और उसके समाधान की कोई ठोस संभावना न दिखने के कारण मुद्रास्फीति और संवृद्धि दोनों के लिए जोखिम बढ़ गए हैं। ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है; कच्चे तेल के भंडार घट रहे हैं और वैश्विक पण्य की कीमतों में वृद्धि हुई है। कठिन विकल्पों के बीच, मौद्रिक नीति अधिक सतर्क हो गई है। प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को सख्त करने की ओर रुख कर सकते हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में मिश्रित रुझान दिख रहे हैं, जहाँ एआई को लेकर आशावाद के कारण इक्विटी मजबूत बनी हुई है, जबकि राजकोषीय स्थिरता और मुद्रास्फीति की चिंताओं के कारण सोवरेन बॉण्ड प्रतिफल में वृद्धि हुई है। दरों को लेकर बदलती उम्मीदों और जोखिम धारणा में बदलाव के बीच हाल ही में अमेरिकी डॉलर सूचकांक में मजबूती आई है।
घरेलू संभावना
4. विभिन्न उच्च-आवृत्ति संकेतकों के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद भी देश की आर्थिक गतिविधियाँ काफी हद तक स्थिर बनी रहीं। निजी उपभोग सुदृढ़ रहा, जबकि लागत के दबाव बढ़ने के बावजूद स्थिर निवेश ने अपनी गति बनाए रखी। अप्रैल 2026 में वाणिज्य वस्तु निर्यात में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, हालांकि माल ढुलाई और बीमा की बढ़ी हुई लागत अभी भी एक बाधा बनी हुई है। सेवा निर्यात भी लगातार मजबूत रहे। हालाँकि अब तक अर्थव्यवस्था ने इस संघर्ष के प्रभाव-विस्तार को सीमित प्रभाव के साथ झेला है, लेकिन इसके कारण उत्पन्न दबाव धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट होने लगे हैं।
5. आगे चलकर, ऊर्जा तथा अन्य पण्यों की उच्च कीमतें और आपूर्ति में लगातार बनी हुई बाधाएँ, आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। प्रभावित पण्यों के आयात स्रोतों में विविधता लाने से आपूर्ति की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन इसकी लागत अधिक है। हालाँकि, इसका पूर्ण प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक जारी रहता है, आपूर्ति शृंखलाओं को सामान्य होने में कितना समय लगता है, तथा विभिन्न हितधारकों के बीच भार आबंटन की क्या पद्धति रहती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिसका प्रभाव कृषि गतिविधियों और ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। हालाँकि, अन्य के साथ-साथ फसल विविधीकरण, जल संचयन एवं संरक्षण, जलवायु- अनुकूल पद्धतियों तथा कम अवधि वाली फसलों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों और पहलों से इन प्रभावों को कम करने में सहायता मिलने की आशा है। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूत प्रगति, जीएसटी के युक्तिकरण का जारी प्रभाव तथा रोजगार की व्यापक रूप से स्थिर स्थिति, शहरी उपभोग को समर्थन देती रहेगी। उच्च क्षमता उपयोग, बैंकों और गैर-बैंकिंग स्रोतों से ऋण प्रवाह का लगातार बने रहना तथा सरकार के पूंजीगत व्यय से निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना है। हालाँकि, वैश्विक मांग की कमजोरी तथा माल ढुलाई और बीमा की उच्च लागतें, वाणिज्य वस्तु निर्यात के लिए चुनौती बनी रहेंगी, लेकिन सेवा निर्यात के स्थिर बने रहने की उम्मीद है।
6. सरकार द्वारा उठाए गए अनेक कदमों, जिनमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों और निर्यात क्षेत्र को सहायता प्रदान करना, घरेलू गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति को बढ़ाना, आयातित इनपुट्स के स्थान पर देश में निर्मित विकल्पों के उपयोग को प्रोत्साहित करना, तथा महत्वपूर्ण आयातों में विविधता लाना भी शामिल हैं, ने बाहरी आघातों का सामना करने के लिए अर्थव्यवस्था की आघात-सहनीयता को मजबूत किया है।
7. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जोकि पहली तिमाही में 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहना अनुमानित है (चार्ट 1)। हालाँकि, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक बनी रहने वाली बाधाएँ, वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता तथा मौसम संबंधी आघात, घरेलू संवृद्धि की संभावनाओं के लिए अधोगामी जोखिम उत्पन्न कर रहे हैं।
8. हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति मार्च 2026 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत और अप्रैल 2026 में 3.5 प्रतिशत हो गई, जिसका मुख्य कारण खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि थी। ईंधन मुद्रास्फीति नियंत्रित रही, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि के बावजूद मार्च और अप्रैल के दौरान खुदरा ईंधन की कीमतों में अधिकांशतः कोई बदलाव नहीं हुआ। मूल मुद्रास्फीति (अर्थात्, खाद्य और ईंधन को छोड़कर सीपीआई) जनवरी से अप्रैल 2026 के दौरान 3.7 प्रतिशत पर स्थिर रही। कीमती धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति बहुत ही कम, लगभग 2.1- 2.2 प्रतिशत के स्तर पर रही। यह दर्शाता है कि इनपुट लागत का दबाव, जो अप्रैल में डब्ल्यूपीआई में तेज वृद्धि के रूप में दिखाई दिया, अभी तक पूरी तरह से सीपीआई में परिलक्षित नहीं हुआ है।
9. हालाँकि, मई 2026 से खुदरा ईंधन कीमतों में संचयी रूप से वृद्धि की गई है, जिसमें पेट्रोल की कीमतों में कुल 7.4 प्रतिशत तथा डीज़ल की कीमतों में कुल 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस वृद्धि का हेडलाइन मुद्रास्फीति पर प्रत्यक्ष प्रभाव लगभग 36 आधार अंक पड़ने का अनुमान है, साथ ही, इसके द्वितीयक प्रभाव भी होंगे, जो आने वाले महीनों में सीपीआई में दिखाई देंगे। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का परिवर्ती प्रभाव, अन्य कई क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है, जैसे वाणिज्यिक एलपीजी, औद्योगिक कच्चा माल, रसायन, रबर तथा प्लास्टिक उत्पाद। उच्च इनपुट लागतों का यह दूसरे चरण का प्रभाव, भविष्य में सीपीआई मुद्रास्फीति पर ऊर्ध्वगामी दबाव बना सकता है।
10. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1 प्रतिशत लगाया गया है, जोकि पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.1 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 5.4 प्रतिशत मुद्रास्फीति रहने का अनुमान है। मूल मुद्रास्फीति वर्ष 2026-27 के लिए 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है (चार्ट 2)। कीमती धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति का अनुमान इससे कम है, जो यह संकेत देता है कि मांग संबंधी दबाव अभी भी नियंत्रित बना हुआ है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान तथा मानसून के भौगोलिक और समयगत वितरण को लेकर बनी अनिश्चितताओं के कारण ये अनुमान, ऊर्ध्वगामी जोखिम के अधीन हैं। तथापि, खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार और जलाशयों में संतोषजनक जल स्तर कुछ राहत प्रदान करते हैं।
मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों का औचित्य
11. पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद से वैश्विक परिस्थितियों में गिरावट आई है तथा संघर्ष एक क्षणिक युद्धविराम के बीच भी जारी है। आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक बनी रहने वाली बाधाओं तथा ऊर्जा की ऊँची कीमतों के प्रतिकूल प्रभाव, संवृद्धि के अनुमानों में कमी और मुद्रास्फीति के अनुमानों में वृद्धि के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जैसा कि ऊपर अप्रैल की मौद्रिक नीति की तुलना में चर्चा की गई है।
12. वैश्विक आघातों के बावजूद सीपीआई मुद्रास्फीति अभी भी निर्धारित लक्ष्य से नीचे बनी हुई है, क्योंकि घरेलू कीमतों पर इनका प्रभाव सीमित रहा है। जबकि मूलभूत अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़कर सहन- सीमा के ऊपरी स्तर के निकट पहुँच सकती है,यह अपेक्षा की जा रही है कि आपूर्ति-जनित आघात का प्रभाव चौथी तिमाही से धीरे-धीरे कम होने लगेगा। अभी अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव सामान्यतः नियंत्रित और संतुलित बने हुए हैं। तथापि, अपेक्षाओं और मजदूरी पर पड़ने वाले द्वितीयक प्रभावों के माध्यम से मुद्रास्फीति की बढ़ने की संभावना स्पष्ट रूप से मौजूद है, इसलिए इस पर सतर्क निगरानी रखने की आवश्यकता है। सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान तथा एल-नीनो से जुड़े जोखिमों के कारण संभावना अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
13. संवृद्धि के संदर्भ में, ऊर्जा की उच्च कीमतें और वैश्विक आपूर्ति संबंधी बाधाएँ, आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल विस्तार- प्रभाव डाल रही हैं। जबकि, घरेलू मांग अभी भी आघात-सह बनी हुई है तथा विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं, फिर भी उच्च-आवृत्ति संकेतकों से कुछ क्षेत्रों में संवृद्धि की गति धीमी पड़ने के शुरुआती संकेत दिखाई दे रहे हैं।
14. जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, एमपीसी द्वारा मुद्रास्फीति और संवृद्धि के लिए किए गए मूलभूत आकलन के सामने काफी जोखिम मौजूद हैं। ये जोखिम मुख्यतः संघर्ष की अवधि और तीव्रता , उसके विस्तार- प्रभावों की मात्रा तथा आपूर्ति शृंखलाओं के सामान्य होने की गति को लेकर बनी अनिश्चितताओं के कारण हैं। इसके अतिरिक्त, सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान और एल-नीनो से जुड़े जोखिमों के कारण खाद्य संबंधी संभावना भी अनिश्चित बनी हुई है। यद्यपि उच्च मुद्रास्फीति के जोखिम बढ़ गए हैं, फिर भी मौद्रिक नीति समिति का मानना है कि अधिक स्पष्टता आने तक प्रतीक्षा करना विवेकपूर्ण होगा। तदनुसार, मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दर को यथावत् रखने के पक्ष में वोट किया। साथ ही, एमपीसी आगे भी आँकड़ों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाए रखेगी और घटनाक्रमों पर कड़ी निगरानी रखेगी। इसमें विशेष रूप से यह देखा जाएगा कि कहीं आपूर्ति-पक्ष के दबाव सामान्य मूल्य स्तर और मुद्रास्फीति की प्रत्याशाओं में स्थायी रूप से शामिल तो नहीं हो रहे हैं। एमपीसी ने तटस्थ रुख को भी बनाए रखने का निर्णय लिया।
15. एमपीसी की बैठक का कार्यवृत्त 19 जून 2026 को प्रकाशित की जाएगी।
16. एमपीसी की अगली बैठक 3 से 5 अगस्त 2026 के दौरान निर्धारित है।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/385 |