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वित्तीय समावेशन और विकास

यह कार्य वित्तीय समावेशन, वित्तीय शिक्षण को बढ़ावा देने और ग्रामीण तथा एमएसएमई क्षेत्र सहित अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों के लिए ऋण उपलब्ध कराने पर नवीकृत राष्ट्रीय ध्यानकेंद्रण का सार संक्षेप में प्रस्तुत करता है।

विहंगावलोकन

  • प्राथमिकता-प्राप्‍त क्षेत्रों के लिए ऋण की उपलब्धता: प्राथमिकता-प्राप्‍त क्षेत्रों के लिए ऋण की उपलब्धता को समर्थन प्रदान करने के लिए समष्टि नीति का निर्माण। यह सुनिश्चित करना कि समाज के वित्‍तीय रूप से वंचित वर्गों के लिए नए कारोबार अवसर सृजित करने की दृष्टि से प्राथमिकता-प्राप्‍त क्षेत्र ऋण बैंकों के लिए एक साधन बन सके।
  • वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता: बुनियादी औपचारिक वित्तीय सेवाओं और उत्पादों की शृंखला तक पहुंच सुनिश्चित करना और वित्तीय जागरूकता संबंधी पहलों को बढ़ाना। वित्तीय समावेशन के लिए राष्‍ट्रीय कार्यनीति (एनएसएफआई) 2025-30 और वित्तीय समावेशन के लिए राष्‍ट्रीय कार्यनीति (एनएसएफआई): 2020-25, भारत में वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता नीतियों के विज़न और प्रमुख उद्देश्यों को इस प्रकार निर्धारित करती हैं कि वित्तीय क्षेत्र के सभी हितधारकों को शामिल करते हुए व्यापक स्तर पर कार्रवाई में समन्‍वय स्थापित करके पहुंच का दायरा बढ़ाया जाए और प्रयासों को बनाए रखा जाए।
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण की उपलब्धता: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को ऋण की इष्टतम उपलब्धता सुनिश्चित करने, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के खातों में दबाव को दूर करने और लक्ष्यबद्ध क्षमता निर्माण के लिए नीतियां तैयार करना।
  • स्वयं सहायता समूहों, अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति समुदायों और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए ऋण की उपलब्धता: चुनिंदा सरकारी योजनाओं के माध्यम से व्यक्तियों, स्वयं सहायता समूहों, अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए ऋण की उपलब्धता बढ़ाना।
  • कृषि और संबद्ध कार्यकलापों के लिए ऋण की उपलब्धता: (i) किसानों को वित्त तक आसानी से पहुंच को साकार करने के लिए व्यापक दिशानिर्देश देना और (ii) प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में उधारकर्ताओं के लिए किए जाने वाले राहत उपायों की निगरानी करना।
  • संस्थाएं: उक्त उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अग्रणी बैंक योजना के अंतर्गत संस्थागत व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना, जैसे कि राज्य स्तरीय बैंकर समितियां (एसएलबीसी), ज़िला परामर्शदात्री समितियां (डीसीसी), जिला स्तरीय पुनरीक्षण समितियां (डीएलआरसी) और खंड स्तरीय बैंकर समितियां (बीएलबीसी)।

हमारा दृष्टिकोण

आगे की राह


अर्थव्‍यवस्‍था के ऐसे क्षेत्रों, जिनका योगदान सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए महत्‍वपूर्ण है, को बैंकिंग प्रणाली से पर्याप्‍त रूप में ऋण उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से प्राथमिकता-प्राप्‍त क्षेत्र ऋण संबंधी दिशानिर्देशों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। इसमें ऐसे विशिष्‍ट क्षेत्रों पर ध्‍यान केंद्रित किया जाता है जिनकी ऋण-पात्रता होने के बावजूद ऋण-संबंधी आवश्‍यकताएं पूरी नहीं होती हैं। वाणिज्यिक बैंकों को भारत सरकार के राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन ढांचे के अंतर्गत आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित पात्र उधारकर्ताओं को सहायता प्रदान करने का भी दायित्‍व सौंपा गया है।

देश में वित्तीय समावेशन की प्रगति को समग्र रूप से बढ़ाने और बनाए रखने की दृष्टि से वित्तीय समावेशन के लिए राष्ट्रीय रणनीति 2025-30 के कार्रवाई बिंदुओं को लागू करना और एफआई सूचकांक और विखंडित (डिसएग्रीगेटेड) डेटा के माध्यम से वित्तीय समावेशन परिदृश्य में प्रगति की निगरानी करना।

वित्तीय साक्षरता केंद्र के माध्यम से जनता के बीच वित्तीय साक्षरता जागरूकता को मजबूत करना।

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