आरबीआई/विसविवि/2025-26/196
विसविवि.केंका.पीएसडी.बीसी.सं.11/04.09.001/2025-26
19 जनवरी 2026
भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार – लक्ष्य और वर्गीकरण) (संशोधन) निदेश, 2026
कृपया भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार – लक्ष्य और वर्गीकरण) निदेश, 2025 (जिसे आगे "निदेश" कहा गया है) का संदर्भ लें।
2. समीक्षा करने पर, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 और 35ए के साथ धारा 56 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (इसके बाद रिज़र्व बैंक कहा जाएगा) को इस संबंध में सक्षम बनाने वाले अन्य सभी प्रावधानों/कानूनों का प्रयोग करते हुए, रिज़र्व बैंक संतुष्ट है कि ऐसा करना जनहित में आवश्यक और उचित है, इसलिए वह इसके द्वारा निम्नलिखित संशोधन निर्देश जारी करता है।
3. संशोधन निदेश निम्नलिखित अनुसार निदेशों में संशोधन करते हैं:
i. पैरा 6.1 में तालिका में मद संख्या V में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाता है:
“बुनियादी ढांचे और किफायती आवास के लिए दीर्घावधि बांड जारी करने पर छूट के लिए पात्र राशि, जैसा कि 15 जुलाई 2014 के परिपत्र डीबीओडी.बीपी.बीसी.सं25/08.12.014/2014-15 भारतीय रिज़र्व बैंक (संसाधन जुटाने के मानदंड) निदेश, 2025, वाणिज्यिक बैंकों और लघु वित्त बैंकों पर लागू, में निर्धारित है।“
ii. पैरा 6.1 में तालिका की मद VI में एक फुटनोट जोड़कर आंशिक संशोधन किया जाता है:
“पात्र वृद्धिशील एफसीएनआर (बी)/एनआरई जमा से उत्पन्न संसाधनों से दिए गए वृद्धिशील अग्रिमों की गणना 7 मार्च 2014 (यूसीबी के मामले में 13 जून 2014) को भारत में बकाया अग्रिमों और आधार तारीख (26 जुलाई 2013) के बीच के अंतर के रूप में की जाती है। प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र लक्ष्यों की गणना के लिए एएनबीसी से बाहर रखी जाने वाली राशि, उपर्युक्त परिपत्रों के अनुसार सीआरआर / एसएलआर के रखरखाव से छूट के लिए पात्र वृद्धिशील एफसीएनआर (बी) / एनआरई जमा से अधिक नहीं होगी। यदि बकाया राशि में अंतर शून्य या ऋणात्मक है, तो प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से एएनबीसी से कटौती के लिए कोई भी राशि पात्र नहीं होगी।“
iii. पैरा 6.2 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
क्रेडिट इकुइवलेंट ऑफ ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोजर (सीईओबीएसई) की गणना के प्रयोजन के लिए, बैंकों को आरबीआई के विनियमन विभाग द्वारा 3 जून 2019 को जारी डीबीआर.सं. बीपी.बीसी.43/21.01.003/2018-19 'वृहत् एक्सपोज़र ढांचा' पर परिपत्र (समय-समय पर अद्यतन) द्वारा निर्देशित किया जाएगा। यूसीबी को ‘पूंजी पर्याप्तता संबंधी विवेकपूर्ण मानदंड - शहरी सहकारी बैंक’ पर भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा दिनांक 20 अप्रैल 2023 को जारी मास्टर परिपत्र में दिये गए प्रासंगिक प्रावधानों से मार्गदर्शित होंगे।
“क्रेडिट इकुइवलेंट ऑफ ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोजर (सीईओबीएसई) की गणना के प्रयोजन के लिए, बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (पूंजी पर्याप्तता संबंधी विवेकपूर्ण मानदंड) निदेश, 2025 और भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - संकेंद्रण जोखिम प्रबंधन) निदेश, 2025 द्वारा दिशानिर्देशित होंगे, जैसा कि लघु वित्त बैंकों, शहरी सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर लागू होता है। स्थानीय क्षेत्र बैंकों के मामले में, तुलन पत्र से इतर मदों से जुड़े ऋण जोखिम की गणना के उद्देश्य से, बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (स्थानीय क्षेत्र बैंक - पूंजी पर्याप्तता संबंधी विवेकपूर्ण मानदंड) निदेश, 2025 का संदर्भ ले सकते हैं।“
iv. पैरा 6.3 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
लघु वित्त बैंक, एएनबीसी की गणना हेतु पुराने ऋणों के संबंध में, विनियमन विभाग द्वारा लघु वित्त बैंकों के लिए जारी परिचालन दिशानिर्देशों के पैरा 6.5 (ii से vii) (आरबीआई/2016/17/81 बैंविवि.एनबीडी.सं.26/16.13.218/2016-17, दिनांक 06 अक्तूबर 2016) द्वारा आगे मार्गदर्शित होंगे।
“एएनबीसी की गणना के लिए, पुराने ऋणों के संबंध में एसएफबी को आगे मार्गदर्शन निम्नलिखित के अनुसार दिया जाएगा:
क. भारतीय रिज़र्व बैंक (लघु वित्त बैंक - लाइसेंसिंग) दिशानिर्देश, 2025 के पैरा ग.10.33 में दिए गए प्रावधान उन मामलों पर लागू होंगे जहां कोई मौजूदा एनबीसी/एमएफआई एक एसएफबी की स्थापना करता है और अपने व्यवसाय को एसएफबी में स्थानांतरित करता है, रूपांतरण के मामलों को छोड़कर।
ख. उधार देने वाले बैंकों को ऐसे एनबीएफसी को दिए गए ऋणों के लिए पीएसएल वर्गीकरण का लाभ उठाने की अनुमति होगी, बशर्ते कि ऐसे ऋणों से वित्तपोषित परिसंपत्तियां पीएसएल के लिए पात्र परिसंपत्तियां हों। उधार देने वाले बैंकों को यह छूट केवल एसएफबी के प्रारंभिक बैलेंस शीट में मौजूद अंतर्निहित परिसंपत्तियों द्वारा समर्थित वास्तविक बकाया राशि की सीमा तक और केवल अंतर्निहित ऋणों की चुकौती तक ही विस्तारित की जाएगी।
ग. बैंकों से लिए गए उपरोक्त ऋणों से वित्तपोषित संपत्तियों को एसएफबी के लिए प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र की गणना हेतु एएनबीसी में शामिल नहीं किया जाएगा, उस हद तक जहां तक उधार देने वाले बैंक को ऐसे पुराने ऋणों पर पीएसएल का दर्जा प्राप्त है।
घ. ऐसे बकाया पुराने उधारों से निर्मित कोई भी नई परिसंपत्ति या परिचालन शुरू होने के बाद एसएफबी द्वारा निर्मित कोई भी नई परिसंपत्ति, सामान्य तौर पर, एसएफबी के एएनबीसी में गिनी जाएगी और एसएफबी पर लागू होने वाले पीएसएल मानदंड लागू होंगे।
ङ. उपर्युक्त प्रतिपादन परिवर्तित संस्थाओं के मामलों में पुराने ऋणों पर भी लागू होगा।
च. एसएफबी के परिचालन शुरू होने के बाद 31 मार्च को जारी की गई पहली लेखा परीक्षित बैलेंस शीट, एसएफबी के पहले पीएसएल लक्ष्य का आधार बनेगी (अगले वर्ष के लिए)।“
v. पैरा 7.1 में दी गई तालिका को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
| श्रेणी |
लक्ष्य/उप-लक्ष्य |
| घरेलू वाणिज्यिक बैंक (आरआरबी और एसएफबी को छोड़कर) एवं 20 और उससे अधिक शाखाओं वाले विदेशी बैंक |
20 से कम शाखाओं वाले विदेशी बैंक |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक |
लघु वित्त बैंक |
| कुल प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र |
ऊपर पैरा 6 में की गई गणना के अनुसार समायोजित निवल बैंक ऋण का या सीईओबीएसई का 40 प्रतिशत, इनमें से जो भी अधिक हो। |
ऊपर पैरा 6 में की गई गणना के अनुसार समायोजित निवल बैंक ऋण का या सीईओबीएसई का 40 प्रतिशत, इनमें से जो भी अधिक हो; जिसमें से 32 प्रतिशत तक के ऋण निर्यात ऋण के रूप में हो सकता है तथा किसी अन्य प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र के लिए ऋण 8 प्रतिशत से कम नहीं हो सकता है। |
ऊपर पैरा 6 में की गई गणना के अनुसार समायोजित निवल बैंक ऋण का या सीईओबीएसई, का 75 प्रतिशत, इनमें से जो भी अधिक हो; तथापि, मध्यम उद्यम, सामाजिक बुनियादी संरचना तथा नवीकरणीय ऊर्जा को दिए गए उधार में से प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र की उपलब्धि की गणना हेतु एएनबीसी के 15 प्रतिशत पर ही विचार किया जाएगा। |
उपर्युक्त पैरा 6 में गणना के अनुसार एएनबीसी का या सीईओबीएसई का 75 60 प्रतिशत, जो भी अधिक हो। |
vi. पैरा 9.3(iv) हटा दिया जाएगा।
vii. पैरा 10.2(iv) हटा दिया जाएगा।
viii. पैरा 11(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
निर्यात ऋण पर आरबीआई द्वारा दिनांक 01 जुलाई 2015 को रुपया/विदेशी मुद्रा निर्यात ऋण तथा निर्यातकों को ग्राहक सेवा पर जारी मास्टर परिपत्र बैंविवि.सं.डीआईआर.बीसी. 14/04.02.002/2015-16 में परिभाषित तथा समय-समय पर अद्यतन किए गए अनुसार पोतलदान-पूर्व और पोतलदानोत्तर निर्यात ऋण (तुलन पत्र से इतर मदों को छोड़कर) शामिल है।
“निर्यात ऋण पर भारतीय रिज़र्व बैंक (ऋण सुविधाएँ) निदेश, 2025, जो वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों और शहरी सहकारी बैंकों पर लागू हैं, में परिभाषित अनुसार पोतलदान-पूर्व और पोतलदानोत्तर निर्यात ऋण (तुलन पत्र से इतर मदों को छोड़कर) शामिल है।“
ix. पैरा 11(ii) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“कृषि और एमएसएमई को निर्यात ऋण संबंधित श्रेणियों में और उसमें उल्लिखित कुल सीमाओं के अधीन पीएसएल के रूप में वर्गीकरण के लिए पात्र होगा।“
x. पैरा 13 में आंशिक संशोधन पैरा के अंत में निम्नलिखित नोट जोड़कर किया जाएगा:
“नोट: जनसंख्या आधारित वर्गीकरणों के अनुपालन का निर्धारण करने के लिए बैंक जनगणना 2011 की तालिका "ए-04" में दिए गए 'शहरी समूह' (यू.ए.)/ कस्बों के स्तर पर जनसंख्या का संदर्भ ले सकते हैं। गांवों/ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित संपत्तियों के लिए आवास ऋण (जो जनगणना 2011 की तालिका ए-04 का हिस्सा नहीं हैं) के संबंध में, "10 लाख से कम जनसंख्या वाले केंद्रों" के अनुसार ऋण सीमा का पालन किया जा सकता है।“
xi. पैरा 14.2 को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
टियर II से टियर VI केंद्रों में स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं के निर्माण के लिए प्रति उधारकर्ता ₹12 करोड़ तक का ऋण। शहरी सहकारी बैंकों के मामले में, समकक्ष केंद्र श्रेणी ‘डी’ में हैं।
“टियर II से टियर VI केंद्रों में स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं के निर्माण के लिए प्रति उधारकर्ता ₹12 करोड़ तक का ऋण। शहरी सहकारी बैंकों के मामले में, समकक्ष केंद्र वे हैं जिनकी जनसंख्या 1 लाख से कम है।“
xii. पैरा 16(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
दिनांक 14 मार्च 2022 के मास्टर निदेश - भारतीय रिज़र्व बैंक (सूक्ष्मवित्त ऋणों के लिए विनियामकीय ढांचा) निदेश, 2022 में निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले एसएचजी/जेएलजी के व्यक्तियों और व्यक्तिगत सदस्यों को बैंकों द्वारा सीधे प्रदान किए गए ऋण।
“सूक्ष्म वित्त भारतीय रिज़र्व बैंक (ऋण सुविधाएँ) निदेश, 2025, जो वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, शहरी सहकारी बैंकों और स्थानीय क्षेत्र बैंकों पर लागू होते हैं, में निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले एसएचजी/जेएलजी के व्यक्तियों और व्यक्तिगत सदस्यों को बैंकों द्वारा सीधे प्रदान किए गए ऋण।“
xiii. पैरा 17.1 में दी गई तालिका की मद संख्या iii को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम), राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (एनयूएलएम) और स्वच्छकारों की पुनर्वास के लिए स्व-रोजगार योजना (एसआरएमएस) के अंतर्गत लाभार्थी
“सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) और स्वच्छकारों की पुनर्वास के लिए स्व-रोजगार योजना (एसआरएमएस) के अंतर्गत लाभार्थी”
xiv. पैरा 17.1 में दी गई तालिका की मद संख्या vii को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
ऐसे व्यक्ति और एसएचजी/जेएलजी के व्यक्तिगत सदस्य, जो दिनांक 14 मार्च 2022 के मास्टर निदेश - भारतीय रिज़र्व बैंक (सूक्ष्मवित्त ऋणों के लिए विनियामकीय ढांचा) निदेश, 2022 में निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हों।
“ऐसे व्यक्ति और एसएचजी/जेएलजी के व्यक्तिगत सदस्य, जो भारतीय रिज़र्व बैंक (ऋण सुविधाएँ) निदेश, 2025 में निर्धारित मानदंडों, जैसा कि वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, शहरी सहकारी बैंकों और स्थानीय क्षेत्र बैंकों पर लागू होता है, को पूरा करने वाले सूक्ष्म वित्त ऋणों के लाभार्थी हों।“
xv. पैरा 18(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
आस्तियां बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा मूलत: निर्मित हों और वे प्रतिभूतिकरण से पहले प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत किए जाने के पात्र हो और ‘मानक आस्तियों का प्रतिभूतिकरण’ के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के दिनांक 24 सितंबर 2021 के मास्टर निदेश डीओआर.एसटीआर.आरईसी.53/21.04.177/2021-22 के माध्यम से जारी दिशा-निर्देशों, समय-समय पर अद्यतन, को पूरा करती हो।
“परिसंपत्तियाँ बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा मूलत: निर्मित हों और वे प्रतिभूतिकरण से पहले प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत किए जाने के लिए पात्र हो और भारतीय रिज़र्व बैंक (प्रतिभूतिकरण लेनदेन) निदेश, 2025 के प्रावधान, जो विभिन्न संस्थाओं पर लागू होते हैं, को पूरा करती हो।“
xvi. उक्त निदेशों के पैरा 18 के बाद नया पैरा 18ए निम्नानुसार जोड़ा जाएगा:
“अंतर्निहित पोर्टफोलियो की प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र स्थिति का पता लगाने के लिए, बैंक मूल इकाई द्वारा प्रदान किए गए किसी भी बाहरी लेखा परीक्षक के प्रमाणन और अपने स्वयं के कर्मचारियों या इस उद्देश्य के लिए किसी लेखा परीक्षक द्वारा किए गए नमूना जांच के संयोजन पर भरोसा कर सकते हैं। यह उनकी आंतरिक नीति में निर्दिष्ट हो सकता है।“
xvii. पैरा 18 में उल्लिखित नोट को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
“नोट: पैरा 18 के प्रावधान एसएफबी, एलएबी, आरआरबी और यूसीबी पर लागू नहीं हैं।“
xviii. पैरा 19(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
आस्तियां बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा मूलत: निर्मित हों और वे खरीद से पहले प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत किए जाने के पात्र हो और ‘ऋण एक्सपोजर का हस्तांतरण’ के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के दिनांक 24 सितंबर 2021 के मास्टर निदेश डीओआर. एसटीआर.आरईसी.51/21.04.048/2021-22 के माध्यम से जारी दिशा-निर्देशों, समय-समय पर अद्यतन, को पूरा करती हो।
“परिसंपत्तियाँ बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा मूलत: निर्मित हों और वे खरीद से पहले प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत किए जाने के पात्र हो और भारतीय रिज़र्व बैंक (ऋण जोखिम का हस्तांतरण एवं वितरण) निदेश, 2025 के प्रावधान, जो वाणिज्यिक बैंकों और लघु वित्त बैंकों पर लागू होते हैं, को पूरा करती हो।“
xix. पैरा 19 में उल्लिखित टिप्पणी को निम्नलिखित अनुसार आंशिक रूप से संशोधित किया जाएगा:
“नोट: पैरा 19 के प्रावधान एलएबी, आरआरबी और यूसीबी पर लागू नहीं हैं।.”
xx. पैरा 20(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“बैंकों द्वारा जोखिम साझा करने के आधार पर खरीदे गए आईबीपीसी, प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र की संबंधित श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकरण के लिए पात्र हैं बशर्तें, अंतर्निहित परिसंपत्तियाँ संबंधित श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकृत किए जाने की पात्र हों और बैंक आईबीपीसी पर भारतीय रिज़र्व बैंक के दिनांक 31 दिसंबर 1988 के परिपत्र डीबीओडी.सं.बीपी.बीसी. 57/62-88 के माध्यम से जारी दिशानिर्देशों, समय-समय पर अद्यतन, भारतीय रिज़र्व बैंक (ऋण जोखिम का हस्तांतरण एवं वितरण) निदेश, 2025 के प्रासंगिक प्रावधान, जो वाणिज्यिक बैंकों और लघु वित्त बैंकों पर लागू होते हैं, को पूरा करते हों।“
xxi. पैरा 20 के नोट में में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“नोट: अनुच्छेद 20 के प्रावधान एलएबी, आरआरबी और यूसीबी पर लागू नहीं होते हैं।.”
xxii. अनुच्छेद 21 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
बैंकों को प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार प्रमाणपत्रों पर भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुसार पीएसएलसी खरीदने/बेचने की अनुमति है, जो 7 अप्रैल 2016 के परिपत्र विसविवि.केंका.प्लान.बीसी.23/04.09.001/2015-16 के साथ पठित 24 मार्च 2025 के परिपत्र विसविवि.केंका.प्लान.बीसी.12/04.09.001/2024-25 के माध्यम से जारी किए गए हैं। जारी किए गए और खरीदे गए पीएसएलसी का निवल अंकित मूल्य संबंधित प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकरण के लिए पात्र होगा, बशर्ते कि बैंकों द्वारा सृजित अंतर्निहित परिसंपत्तियां प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पात्र हों। एसएफबी को क्रेडिट जोखिम हस्तांतरण और पोर्टफोलियो बिक्री/खरीद पर 6 अक्टूबर 2016 को जारी डीबीआर परिपत्र संख्या डीबीआर.एनबीडी.26/16.13.218/2016-17 के पैरा 1.9 में निर्दिष्ट नियमों और शर्तों द्वारा निर्देशित किया जाएगा।
“बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार प्रमाणपत्र पर पीएसएलसी खरीदने/बेचने की अनुमति है जैसा कि अनुबंध IIIक में विस्तृत है। जारी और खरीदे गए पीएसएलसी की नेट नॉमिनल वैल्यू संबंधित प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र श्रेणियों के तहत वर्गीकरण के लिए पात्र होगी, बशर्ते बैंकों द्वारा उत्पन्न अंतर्निहित परिसंपत्तियां प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पात्र हों। एसएफबी को केवल समग्र पीएसएल लक्ष्य के भीतर पीएसएल उप-लक्ष्यों को पूरा करने के विशिष्ट उद्देश्य के लिए ही पीएसएलसी खरीदने की अनुमति है।“
xxiii. प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार प्रमाणपत्र (पीएसएलसी) योजना का विवरण प्रदान करने वाला एक नया परिशिष्ट IIIक जोड़ा जाएगा।
xxiv. पैरा 22 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
नीचे पैरा 22 (i) और 22 (ii) के तहत एमएफ़आई को बैंकों द्वारा संवितरित ऋण संबंधित श्रेणियों जैसे कृषि, एमएसएमई, सामाजिक बुनियादी ढांचे और अन्य के तहत प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार के रूप में वर्गीकरण के लिए पात्र हैं, बशर्ते एमएफआई, समय-समय पर अद्यतन दिनांक 1 सितंबर 2016 के मास्टर निदेश डीएनबीआर पीडी.007/03.10.119/2016-17 के अध्याय II (xx) और अध्याय VIII एवं मास्टर निदेश डीएनबीआर पीडी.008/03.10.119/2016-17 के अध्याय II (xx) और अध्याय IX में निर्धारित शर्तों का पालन करें।
“नीचे पैरा 22 (i) और 22 (ii) के तहत एमएफ़आई को बैंकों द्वारा संवितरित ऋण संबंधित श्रेणियों जैसे कृषि, एमएसएमई, सामाजिक बुनियादी ढांचे और अन्य के तहत प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के रूप में वर्गीकरण के लिए पात्र हैं, बशर्ते एमएफआई भारतीय रिज़र्व बैंक (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां - सूक्ष्म वित्त संस्थान) निदेश, 2025 में निर्धारित शर्तों का पालन करें और बैंकों द्वारा सूक्ष्म वित्त संस्थानों से बाह्य लेखा परीक्षकों के प्रमाणपत्र प्राप्त किया जाये, जो इस बात की पुष्टि करते हों कि इन ऋणों के संबंध में किसी अन्य बैंक से आगे-उधार (ऑन-लेंडिंग) लाभ का दावा नहीं किया गया है।“
xxv. पैरा 23 में नया क्रमांक iii निम्नानुसार जोड़ा जाएगा:
“(iii) बैंकों को एनबीएफसी से बाहरी लेखा परीक्षकों के प्रमाणपत्र प्राप्त करने होंगे जो इस बात की पुष्टि करते हों कि ऐसे ऋणों के संबंध में किसी अन्य बैंक से आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) लाभ का दावा नहीं किया गया है।.”
xxvi. पैरा 24 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“आवास वित्त कम्पनियों (एचएफसी) को उनके पुनर्वित्त के लिए एनएचबी द्वारा अनुमोदित बैंक ऋण, व्यक्तिगत आवासीय यूनिटों की खरीद/निर्माण/पुनर्निर्माण के लिए या झुग्गी-झोपड़ी हटाने और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों के पुनर्वास के लिए आगे-उधार (ऑन-लेंडिंग) देने हेतु, ‘आवास’ श्रेणी के अंतर्गत प्रति उधारकर्ता 20 लाख रुपये की कुल ऋण सीमा के अधीन पीएसएल के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पात्र होगा। बैंकों को अंतर्निहित पोर्टफोलियो का उधारकर्ता-वार आवश्यक विवरण बनाए रखना होगा और एचएफसी से बाहरी लेखा परीक्षकों के प्रमाणपत्र प्राप्त करने होंगे, जो इस बात की पुष्टि करते हों कि ऐसे ऋणों के संबंध में किसी अन्य बैंक से आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) लाभ का दावा नहीं किया गया है।.”
xxvii. पैरा 24 के बाद नया पैरा 24ए निम्नानुसार जोड़ा जाएगा:
“24ए. एनसीडीसी को आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) देने के लिए बैंक ऋण इस मास्टर निदेश में निर्धारित उद्देश्यों और गतिविधियों के लिए सहकारी समितियों को आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) देने हेतु राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) को दिया गया बैंक ऋण संबंधित श्रेणियों के अंतर्गत प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पात्र होगा। यह इस शर्त के अधीन है कि एनसीडीसी, सीएजी1 द्वारा सूचीबद्ध सनदी लेखाकार (चार्टर्ड अकाउंटेंट) फर्म द्वारा ऋण देने वाले बैंकों को तिमाही प्रमाणपत्र प्रस्तुत करे, जिसमें यह पुष्टि की गई हो कि बैंक ऋण का उपयोग पीएसएल पात्र उद्देश्यों के लिए सहकारी समितियों को ऋण देने के लिए किया गया है और ऐसे ऋणों के संबंध में किसी अन्य बैंक से आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) लाभ का दावा नहीं किया गया है।
नोट: (i) पैरा 24ए के प्रावधान 19 जनवरी 2026 के बाद बैंकों द्वारा एनसीडीसी को स्वीकृत ऋणों पर लागू होते हैं।
(ii) पैरा 24ए के प्रावधान आरआरबी, यूसीबी, एसएफबी और एलएबी पर लागू नहीं होते हैं।”
xxviii. पैरा 25 में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“पैरा 23, 24 और 24ए 37 में उल्लिखित अनुसार आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) के लिए एनबीएफसी (एचएफसी सहित) और एनसीडीसी को बैंक द्वारा दिया गया ऋण, पिछले वित्तीय वर्ष में व्यक्तिगत बैंक के कुल प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार के 5% की समग्र सीमा तक पीएसएल वर्गीकरण के लिए पात्र होगा। बैंक चालू वित्तीय वर्ष की चार तिमाहियों में आगे – उधार (ऑन-लेंडिंग) तंत्र के तहत पात्र पोर्टफोलियो का औसत निकालकर निर्धारित सीमा के अनुपालन का निर्धारण करेंगे। नवीन लाइसेंस प्राप्त बैंक के मामले में, यह सीमा उसके संचालन के पहले वर्ष के दौरान निरंतर आधार पर लागू रहेगी।”
xxix. पैरा 26 को निम्नानुसार प्रतिस्थापित किया जाएगा:
“26. सह-उधार
भारतीय रिजर्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - ऋण जोखिम का हस्तांतरण और वितरण) निदेश, 2025 के अनुसार, बैंकों को प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्रों को उधार देने के लिए सह-उधार व्यवस्था में प्रवेश करने की अनुमति है। बैंकों और एनबीएफसी द्वारा प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को सह-उधार देने संबंधी दिनांक 5 नवंबर 2020 के परिपत्र संख्या विसविवि.केंका.प्लान.बीसी.सं.8/04.09.01/2020-21 तथा बैंकों और एनबीएफसी द्वारा प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार देने हेतु सह-उत्पत्ति संबंधी दिनांक 21 सितंबर 2018 के परिपत्र संख्या विसविवि.केंका.प्लान.बीसी.08/04.09.01/2018-19 के अनुसार दिए गए ऋण, चुकौती/परिपक्वता, जो भी पहले हो, तक प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र वर्गीकरण के लिए पात्र बने रहेंगे।
नोट: पैरा 26 के प्रावधान आरआरबी, यूसीबी, एसएफबी और एलएबी पर लागू नहीं हैं।“
xxx. पैरा 28(ii) में उल्लिखित रिपोर्टिंग प्रारूपों को अद्यतन किया जाएगा:
“प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र अग्रिमों के आंकड़े बैंकों द्वारा संबंधित रिपोर्टिंग प्रारूप के अनुसार तिमाही और वार्षिक अंतराल पर, प्रत्येक तिमाही और वित्तीय वर्ष के अंत से क्रमशः पंद्रह दिन और एक महीने के भीतर प्रस्तुत किए जाएं।“
xxxi. पैरा 30(i) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
ब्याज की दर: ऋणों पर लगाई जाने वाली ब्याज दरें समय-समय पर संशोधित मास्टर निदेश - भारतीय रिज़र्व बैंक (अग्रिमों पर ब्याज दर) निदेश, 2016 के अनुसार होंगी।
“ब्याज की दर: ऋणों पर लगाए जाने वाले ब्याज की दरें भारतीय रिज़र्व बैंक (अग्रिमों पर ब्याज दर) निदेश, 2025, जो वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, स्थानीय क्षेत्र बैंकों और शहरी सहकारी बैंकों पर लागू होते हैं, के अनुरूप होंगी।“
xxxii. पैरा 30(ii) में निम्नलिखित अनुसार आंशिक संशोधन किया जाएगा:
“(ii) सेवा शुल्क: ₹50,000/- तक के प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र ऋणों पर कोई ऋण संबंधी शुल्क (ऋण गारंटी योजनाओं के गारंटी शुल्क सहित) और तदर्थ सेवा प्रभार/निरीक्षण प्रभार नहीं लगाया जाना चाहिए। एसएचजी/जेएलजी को पात्र प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र ऋणों के मामले में, यह सीमा समग्र समूह की अपेक्षा हर सदस्य पर लागू होगी।.”
xxxiii. निम्नलिखित जिलों को अनुबंध Iए से हटा दिया गया है:
| क्र. सं. |
राज्य |
जिले का नाम |
| 144 |
राजस्थान |
नीम का थाना |
xxxiv. अनुबंध Iबी से निम्नलिखित जिलों को हटा दिया गया है:
| क्र. सं. |
राज्य |
जिलों का नाम |
| 157 |
राजस्थान |
गंगापुरसिटी |
| 158 |
राजस्थान |
जोधपुर ग्रामीण |
| 160 |
राजस्थान |
सांचोर |
4. उपरोक्त संशोधन तत्काल प्रभाव से लागू होगा।
भावदीया,
(निशा नम्बियार)
प्रभारी मुख्य महाप्रबंधक
|