19 जून 2026
मौद्रिक नीति समिति की 3 से 5 जून 2026 के दौरान हुई बैठक का कार्यवृत्त
[भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अंतर्गत]
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी के अंतर्गत गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की इकसठवीं बैठक 3 से 5 जून 2026 के दौरान आयोजित की गई थी।
2. बैठक की अध्यक्षता श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर ने की तथा सभी सदस्य – डॉ. नागेश कुमार, निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक, इंस्टिट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; श्री सौगत भट्टाचार्य, अर्थशास्त्री, मुंबई; प्रोफेसर राम सिंह, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली; डॉ. पूनम गुप्ता, मौद्रिक नीति की प्रभारी उप गवर्नर और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य, कार्यपालक निदेशक (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी(2)(सी) के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित रिज़र्व बैंक के अधिकारी) इसमें उपस्थित रहें।
3. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अनुसार, रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति समिति की प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन इस बैठक की कार्यवाहियों का कार्यवृत्त प्रकाशित करेगा, जिसमें निम्नलिखित शामिल होगा:
ए) मौद्रिक नीति समिति की बैठक में अपनाया गया संकल्प;
बी) मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वोट, जो उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर उस सदस्य द्वारा दिया जाएगा; और
सी) उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर धारा 45ज़ेडआई की उप-धारा (11) के अंतर्गत मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वक्तव्य।
4. वैश्विक और घरेलू मोर्चे पर हो रहे घटनाक्रमों को देखते हुए, एमपीसी ने स्टाफ के समष्टि-आर्थिक अनुमानों की विस्तार से समीक्षा की, जिसमें सर्वेक्षण परिणामों और हितधारकों के साथ परामर्श से प्राप्त इनपुट शामिल थे। एमपीसी ने संभावना के विभिन्न जोखिमों से जुड़े वैकल्पिक परिदृश्यों की भी समीक्षा की। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए और मौद्रिक नीति के रुख पर विस्तृत चर्चा के बाद, एमपीसी ने संकल्प अपनाया जिसे नीचे प्रस्तुत किया गया है।
संकल्प
5. मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 61वीं बैठक 3 से 5 जून 2026 तक श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में आयोजित की गई। एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य बैठक में शामिल हुए।
6. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.00 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।
संवृद्धि और मुद्रास्फीति की संभावना
वैश्विक संभावना
7. पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष लंबे समय तक जारी रहने और उसके समाधान की कोई ठोस संभावना न दिखने के कारण मुद्रास्फीति और संवृद्धि दोनों के लिए जोखिम बढ़ गए हैं। ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है; कच्चे तेल के भंडार घट रहे हैं और वैश्विक पण्य की कीमतों में वृद्धि हुई है। कठिन विकल्पों के बीच, मौद्रिक नीति अधिक सतर्क हो गई है। प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को सख्त करने की ओर रुख कर सकते हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में मिश्रित रुझान दिख रहे हैं, जहाँ एआई को लेकर आशावाद के कारण इक्विटी मजबूत बनी हुई है, जबकि राजकोषीय स्थिरता और मुद्रास्फीति की चिंताओं के कारण सोवरेन बॉण्ड प्रतिफल में वृद्धि हुई है। दरों को लेकर बदलती उम्मीदों और जोखिम धारणा में बदलाव के बीच हाल ही में अमेरिकी डॉलर सूचकांक में मजबूती आई है।
घरेलू संभावना
8. विभिन्न उच्च-आवृत्ति संकेतकों के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद भी देश की आर्थिक गतिविधियाँ काफी हद तक स्थिर बनी रहीं। निजी उपभोग सुदृढ़ रहा, जबकि लागत के दबाव बढ़ने के बावजूद स्थिर निवेश ने अपनी गति बनाए रखी। अप्रैल 2026 में वाणिज्य वस्तु निर्यात में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, हालांकि माल ढुलाई और बीमा की बढ़ी हुई लागत अभी भी एक बाधा बनी हुई है। सेवा निर्यात भी लगातार मजबूत रहे। हालाँकि अब तक अर्थव्यवस्था ने इस संघर्ष के प्रभाव-विस्तार को सीमित प्रभाव के साथ झेला है, लेकिन इसके कारण उत्पन्न दबाव धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट होने लगे हैं।
9. आगे चलकर, ऊर्जा तथा अन्य पण्यों की उच्च कीमतें और आपूर्ति में लगातार बनी हुई बाधाएँ, आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। प्रभावित पण्यों के आयात स्रोतों में विविधता लाने से आपूर्ति की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन इसकी लागत अधिक है। हालाँकि, इसका पूर्ण प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक जारी रहता है, आपूर्ति शृंखलाओं को सामान्य होने में कितना समय लगता है, तथा विभिन्न हितधारकों के बीच भार आबंटन की क्या पद्धति रहती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिसका प्रभाव कृषि गतिविधियों और ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। हालाँकि, अन्य के साथ-साथ फसल विविधीकरण, जल संचयन एवं संरक्षण, जलवायु- अनुकूल पद्धतियों तथा कम अवधि वाली फसलों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों और पहलों से इन प्रभावों को कम करने में सहायता मिलने की आशा है। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूत प्रगति, जीएसटी के युक्तिकरण का जारी प्रभाव तथा रोजगार की व्यापक रूप से स्थिर स्थिति, शहरी उपभोग को समर्थन देती रहेगी। उच्च क्षमता उपयोग, बैंकों और गैर-बैंकिंग स्रोतों से ऋण प्रवाह का लगातार बने रहना तथा सरकार के पूंजीगत व्यय से निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना है। हालाँकि, वैश्विक मांग की कमजोरी तथा माल ढुलाई और बीमा की उच्च लागतें, वाणिज्य वस्तु निर्यात के लिए चुनौती बनी रहेंगी, लेकिन सेवा निर्यात के स्थिर बने रहने की उम्मीद है।
10. सरकार द्वारा उठाए गए अनेक कदमों, जिनमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों और निर्यात क्षेत्र को सहायता प्रदान करना, घरेलू गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति को बढ़ाना, आयातित इनपुट्स के स्थान पर देश में निर्मित विकल्पों के उपयोग को प्रोत्साहित करना, तथा महत्वपूर्ण आयातों में विविधता लाना भी शामिल हैं, ने बाहरी आघातों का सामना करने के लिए अर्थव्यवस्था की आघात-सहनीयता को मजबूत किया है।
11. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जोकि पहली तिमाही में 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहना अनुमानित है (चार्ट 1)। हालाँकि, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक बनी रहने वाली बाधाएँ, वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता तथा मौसम संबंधी आघात, घरेलू संवृद्धि की संभावनाओं के लिए अधोगामी जोखिम उत्पन्न कर रहे हैं।
12. हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति मार्च 2026 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत और अप्रैल 2026 में 3.5 प्रतिशत हो गई, जिसका मुख्य कारण खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि थी। ईंधन मुद्रास्फीति नियंत्रित रही, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि के बावजूद मार्च और अप्रैल के दौरान खुदरा ईंधन की कीमतों में अधिकांशतः कोई बदलाव नहीं हुआ। मूल मुद्रास्फीति (अर्थात्, खाद्य और ईंधन को छोड़कर सीपीआई) जनवरी से अप्रैल 2026 के दौरान 3.7 प्रतिशत पर स्थिर रही। कीमती धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति बहुत ही कम, लगभग 2.1- 2.2 प्रतिशत के स्तर पर रही। यह दर्शाता है कि इनपुट लागत का दबाव, जो अप्रैल में डब्ल्यूपीआई में तेज वृद्धि के रूप में दिखाई दिया, अभी तक पूरी तरह से सीपीआई में परिलक्षित नहीं हुआ है।
13. हालाँकि, मई 2026 से खुदरा ईंधन कीमतों में संचयी रूप से वृद्धि की गई है, जिसमें पेट्रोल की कीमतों में कुल 7.4 प्रतिशत तथा डीज़ल की कीमतों में कुल 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस वृद्धि का हेडलाइन मुद्रास्फीति पर प्रत्यक्ष प्रभाव लगभग 36 आधार अंक पड़ने का अनुमान है, साथ ही, इसके द्वितीयक प्रभाव भी होंगे, जो आने वाले महीनों में सीपीआई में दिखाई देंगे। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का परिवर्ती प्रभाव, अन्य कई क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है, जैसे वाणिज्यिक एलपीजी, औद्योगिक कच्चा माल, रसायन, रबर तथा प्लास्टिक उत्पाद। उच्च इनपुट लागतों का यह दूसरे चरण का प्रभाव, भविष्य में सीपीआई मुद्रास्फीति पर ऊर्ध्वगामी दबाव बना सकता है।
14. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1 प्रतिशत लगाया गया है, जोकि पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.1 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 5.4 प्रतिशत मुद्रास्फीति रहने का अनुमान है। मूल मुद्रास्फीति वर्ष 2026-27 के लिए 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है (चार्ट 2)। कीमती धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति का अनुमान इससे कम है, जो यह संकेत देता है कि मांग संबंधी दबाव अभी भी नियंत्रित बना हुआ है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान तथा मानसून के भौगोलिक और समयगत वितरण को लेकर बनी अनिश्चितताओं के कारण ये अनुमान, ऊर्ध्वगामी जोखिम के अधीन हैं। तथापि, खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार और जलाशयों में संतोषजनक जल स्तर कुछ राहत प्रदान करते हैं।
मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों का औचित्य
15. पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद से वैश्विक परिस्थितियों में गिरावट आई है तथा संघर्ष एक क्षणिक युद्धविराम के बीच भी जारी है। आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक बनी रहने वाली बाधाओं तथा ऊर्जा की ऊँची कीमतों के प्रतिकूल प्रभाव, संवृद्धि के अनुमानों में कमी और मुद्रास्फीति के अनुमानों में वृद्धि के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जैसा कि ऊपर अप्रैल की मौद्रिक नीति की तुलना में चर्चा की गई है।
16. वैश्विक आघातों के बावजूद सीपीआई मुद्रास्फीति अभी भी निर्धारित लक्ष्य से नीचे बनी हुई है, क्योंकि घरेलू कीमतों पर इनका प्रभाव सीमित रहा है। जबकि मूलभूत अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़कर सहन- सीमा के ऊपरी स्तर के निकट पहुँच सकती है,यह अपेक्षा की जा रही है कि आपूर्ति-जनित आघात का प्रभाव चौथी तिमाही से धीरे-धीरे कम होने लगेगा। अभी अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव सामान्यतः नियंत्रित और संतुलित बने हुए हैं। तथापि, अपेक्षाओं और मजदूरी पर पड़ने वाले द्वितीयक प्रभावों के माध्यम से मुद्रास्फीति की बढ़ने की संभावना स्पष्ट रूप से मौजूद है, इसलिए इस पर सतर्क निगरानी रखने की आवश्यकता है। सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान तथा एल-नीनो से जुड़े जोखिमों के कारण संभावना अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
17. संवृद्धि के संदर्भ में, ऊर्जा की उच्च कीमतें और वैश्विक आपूर्ति संबंधी बाधाएँ, आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल विस्तार- प्रभाव डाल रही हैं। जबकि, घरेलू मांग अभी भी आघात-सह बनी हुई है तथा विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं, फिर भी उच्च-आवृत्ति संकेतकों से कुछ क्षेत्रों में संवृद्धि की गति धीमी पड़ने के शुरुआती संकेत दिखाई दे रहे हैं।
18. जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, एमपीसी द्वारा मुद्रास्फीति और संवृद्धि के लिए किए गए मूलभूत आकलन के सामने काफी जोखिम मौजूद हैं। ये जोखिम मुख्यतः संघर्ष की अवधि और तीव्रता, उसके विस्तार- प्रभावों की मात्रा तथा आपूर्ति शृंखलाओं के सामान्य होने की गति को लेकर बनी अनिश्चितताओं के कारण हैं। इसके अतिरिक्त, सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान और एल-नीनो से जुड़े जोखिमों के कारण खाद्य संबंधी संभावना भी अनिश्चित बनी हुई है। यद्यपि उच्च मुद्रास्फीति के जोखिम बढ़ गए हैं, फिर भी मौद्रिक नीति समिति का मानना है कि अधिक स्पष्टता आने तक प्रतीक्षा करना विवेकपूर्ण होगा। तदनुसार, मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दर को यथावत् रखने के पक्ष में वोट किया। साथ ही, एमपीसी आगे भी आँकड़ों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाए रखेगी और घटनाक्रमों पर कड़ी निगरानी रखेगी। इसमें विशेष रूप से यह देखा जाएगा कि कहीं आपूर्ति-पक्ष के दबाव सामान्य मूल्य स्तर और मुद्रास्फीति की प्रत्याशाओं में स्थायी रूप से शामिल तो नहीं हो रहे हैं। एमपीसी ने तटस्थ रुख को भी बनाए रखने का निर्णय लिया।
19. एमपीसी की बैठक का कार्यवृत्त 19 जून 2026 को प्रकाशित की जाएगी।
20. एमपीसी की अगली बैठक 3 से 5 अगस्त 2026 के दौरान निर्धारित है।
नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने के संकल्प पर वोटिंग
| सदस्य |
वोट |
| डॉ. नागेश कुमार |
हाँ |
| श्री सौगत भट्टाचार्य |
हाँ |
| प्रो. राम सिंह |
हाँ |
| श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य |
हाँ |
| डॉ पूनम गुप्ता |
हाँ |
| श्री संजय मल्होत्रा |
हाँ |
डॉ. नागेश कुमार का वक्तव्य
21. पश्चिम एशिया के संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और आपूर्ति बाधित हो गई है। हाइड्रोकार्बन और उर्वरकों के आयात, जिनका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज़ के माध्यम से आता है, पर भारी निर्भरता के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता कीमतों के बारे में चिंताएं बढ़ाती हैं, क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों पर ईंधन और फीडस्टॉक के रूप में विनिर्माण के कई क्षेत्रों की निर्भरता है, हालांकि सरकार ने अब तक केवल सीमित प्रभाव अंतरण ही होने दिया है। भारत के निर्यात के लिए खाड़ी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण गंतव्य है और विप्रेषण का एक प्रमुख स्रोत भी है। इसके अलावा, अल नीनो के कारण प्रभावित मानसून की वजह से कृषि के स्तर पर चिंताएं बढ़ी हैं। वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारत से विदेशी संविभाग निवेश का बहिर्वाह भी हुआ है, जिससे रुपये की विनिमय दर दबाव में आ गई है, इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के भुगतान संतुलन पर प्रभाव को लेकर भी चिंताएं हैं। इसलिए, पश्चिम एशिया संघर्ष निकट भविष्य में भारत के आर्थिक संभावना के लिए एक महत्वपूर्ण आघात है।
22. हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था ने, पिछले अधिकांश आर्थिक संकटों (वैश्विक वित्तीय संकट, टेपर टैंट्रम या कोविड-19 सहित) की तुलना में बहुत ही मजबूत समष्टि-आर्थिक मूल तत्व के साथ इस संकट में प्रवेश किया है। फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने से पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत संवृद्धि और बहुत सौम्य मुद्रास्फीति के 'गोल्डीलॉक्स पल' का आनंद ले रही थी। लगभग 700 बिलियन अमेरिकी डॉलर का स्वस्थ विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि, जो लगभग 11 महीनों के आयात को समाहित करता है, और आघात-सह पण्य निर्यात और मजबूत सेवा निर्यात तथा अदृश्य क्षेत्रों के कारण चालू खाता घाटा मध्यम स्तर पर बना हुआ है। जलाशय का स्तर 10 वर्ष के औसत से 20% अधिक होने से मानसून में संभावित कमियों के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है। किसी भी स्थिति में, समय के साथ, भारतीय कृषि बढ़ती आघात-सहनीयता के साथ मानसून के उतार-चढ़ावों से कम प्रभावित होती है।
23. पिछले कुछ वर्षों में राजकोषीय समेकन पर जोर देने से राजकोषीय घाटे को 2022-23 में सकल घरेलू उत्पाद के 6.5% से 2025-26 में 4.4% तक लाने में मदद मिली है। यह पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए कुछ वित्तीय गुंजाइश प्रदान करता है, जिसमें सार्वजनिक निवेश को बनाए रखकर या बढ़ाकर आर्थिक संवृद्धि को समर्थन देना शामिल है, ताकि बढ़ती लागतों के कारण निजी खपत में किसी भी कमी को कम किया जा सके और कच्चे तेल की उच्च कीमतों के कारण सब्सिडी के बढ़ते बोझ को अवशोषित किया जा सके। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण लागत के दबाव और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से निजी निवेश धारणा प्रभावित हो सकती है, जिसे सार्वजनिक निवेश को बढ़ाकर कम करने की आवश्यकता हो सकती है।
24. संकट के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था के कमजोर होने से भारत के निर्यात की मांग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, विशेष रूप से खाड़ी क्षेत्र में। सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ और यूके सहित अन्य देशों के साथ जो मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) किए हैं, जो चालू वर्ष में लागू होने वाले हैं, वे अन्य क्षेत्रों, विशेष रूप से श्रम-गहन क्षेत्रों में, कम मांग के कारण निर्यात मांग में कुछ कमी को कम करने में मदद कर सकते हैं।
25. उन कारकों के बावजूद जो भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले आघातों की तुलना में वर्तमान आघात को सहने के लिए बेहतर ढंग से तैयार करते हैं, आर्थिक संभावना प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई है। 2026-27 के लिए 6.6% का संवृद्धि संबंधी पूर्वानुमान 2025-26 की 7.6% की संवृद्धि दर (दूसरे अग्रिम अनुमान) से 100 आधार अंक कम है। 2026-27 के लिए सीपीआई हेडलाइन मुद्रास्फीति 5.1% रहने का अनुमान है, जो 2025-26 की 2.1% की बहुत ही सौम्य दर की तुलना में 300 आधार अंकों की वृद्धि को दर्शाता है। ये पूर्वानुमान सपष्टतः पश्चिम एशिया संघर्ष की अवधि से जुड़ी कई अनिश्चितताओं के अधीन हैं। संवृद्धि के न्यूनतम पूर्वानुमान के साथ भी, भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। इस संकट ने तेल की कीमतों में अस्थिरता के प्रति अपनी निर्भरता को कम करने के लिए सौर, पवन, भू-तापीय, जैव ईंधन और परमाणु ऊर्जा की क्षमता का पूरी तरह से उपयोग करते हुए, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव की गति को तेज़ करने की तात्कालिकता की याद भी दिलाई है।
26. हालाँकि, मौजूदा अत्यधिक अनिश्चित आर्थिक वातावरण में, समझदारी यही है कि मौद्रिक नीति के माध्यम से कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले इसके प्रभाव पर अधिक स्पष्टता आने की प्रतीक्षा की जाए। पश्चिम एशिया में उभर रही भू-राजनीतिक स्थिति और भारतीय समष्टि-आर्थिक संभावना, विशेष रूप से संवृद्धि-मुद्रास्फीति की गतिकी पर इसके निहितार्थों पर नज़र रखने की आवश्यकता है। इसलिए, मैं रेपो दर पर यथास्थिति के लिए वोट करता हूँ। मैं तटस्थ रुख बनाए रखने का भी समर्थन करता हूँ।
श्री सौगत भट्टाचार्य का वक्तव्य
27. अप्रैल 2026 में संपन्न हुई पिछली एमपीसी समीक्षा के बाद के दो महीनों के दौरान, मुख्यतः पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा उससे जुड़े भू-राजनीतिक प्रभावों से उत्पन्न जोखिमों के संतुलन में यद्यपि मौलिक रूप से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तथापि अब यह दर्शाता है कि मुद्रास्फीतिक दबाव अधिक सुदृढ़ हो सकते हैं। नीचे दिए गए कारणों के आधार पर, मेरा यह मत है कि भारत में संवृद्धि–मुद्रास्फीति के बीच संतुलन की भावी दिशा अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
1. संवृद्धि के संबंध में, यद्यपि अप्रैल और मई के उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक गतिविधि संकेतक निरंतर आघात- सहनीयता का संकेत देते हैं, तथापि ‘नावकास्ट’ संकेतकों से उक्त गतिविधि में मंदी के संकेत प्राप्त हो रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2026 की चौथी तिमाही के सूचीबद्ध कंपनियों के परिणामों के व्यापक विश्लेषण द्वारा गत तिमाही की अद्यतन स्थिति प्राप्त होगी तथा इससे यह भी संकेत मिल सकेगा कि आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़े प्रभाव किस सीमा तक छोटे उद्यमों को प्रभावित कर सकते हैं।
2. मुद्रास्फीति संबंधी जोखिमों के संदर्भ में, मौजूदा पण्य-आपूर्ति संबंधी आघातों के अतिरिक्त, आधिकारिक मौसम संबंधी पूर्वानुमानों में वर्षा की कमी की आशंका व्यक्त की गई है, जो कृषि उत्पादन तथा मूल्य स्तरों के प्रति अधिक सतर्कता की आवश्यकता को दर्शाती है। ऊर्जा कीमतों के निकट अथवा मध्यम अवधि में संघर्ष-पूर्व स्तरों पर लौटने की कम संभावना है। व्यवधानों के बने रहने का प्रत्येक अतिरिक्त दिन समष्टि-आर्थिक प्रभावों में गैर-रेखीय वृद्धि का कारण बन सकता है। अप्रैल 2026 के डबल्यूपीआई आधारित मुद्रास्फीति में तीव्र वृद्धि तथा निविष्टि लागतों के माल एवं सेवाओं की कीमतों में अंतरण के जोखिम पर भी मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा।
3. मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं के संबंध में, विशेष रूप से, आरबीआई की मुद्रास्फीति प्रत्याशा संबंधी सर्वेक्षण में एक वर्ष आगे की मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं में निरंतर एवं उल्लेखनीय वृद्धि परिलक्षित होती है (और अधिक चिंताजनक रूप से, आधिकारिक मुद्रास्फीति आंकड़ों से अधिक मुद्रास्फीति की धारणा लक्षित होती है) । इसकी पुष्टि भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद के व्यवसाय मुद्रास्फीति प्रत्याशा संबंधी सर्वेक्षण द्वारा भी होती है।
4. वित्तीय वर्ष 2026 की चौथी तिमाही का भारत का भुगतान संतुलन संबंधी आँकड़ा जारी होना अभी शेष है, लेकिन पूंजी खाते पर वैश्विक भू-आर्थिक व्यवधानों का प्रभाव पड़ने की आशंका बनी हुई है। बढ़ते वैश्विक मुद्रास्फीतिक दबावों के परिणामस्वरूप प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों की दर कार्रवाईयां की संभावना, अब दरों को यथावत बनाए रखने अथवा उनको बढ़ाने की दिशा में मुड़ गई है, जिसके कारण भारत में पूंजी प्रवाह पर प्रभाव-विस्तार और अधिक बढ़ सकते हैं। कुछ प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों की वास्तविक ‘तटस्थ’ नीतिगत दरों में भी वृद्धि होने की संभावना है।
5. मौजूदा अनिश्चितता के कारण भले ही मात्रात्मक अनुमानों का प्रभाव सीमित हो, तथापि, संवृद्धि और मुद्रास्फीति पर एमपीसी के अनुमान यह संकेत देते हैं कि नीतिगत दर को परिवर्तित करते समय दोनों ही पैमानों से जुड़े जोखिमों को देखते हुए सावधानी बरतने की ज़रूरत है। अब चुनौती यह निर्धारण करना है कि क्या वर्तमान आघात अस्थायी हैं अथवा अर्थव्यवस्था में निरंतर प्रसारित हो रहे हैं। साथ ही, मुद्रास्फीति और संवृद्धि के अपने-अपने लक्ष्यों एवं आकांक्षाओं की ओर लौटने में अपेक्षित समयावधि और अधिक बढ़ गई है।
28. अप्रैल 2026 के अपने वक्तव्य में मैंने उल्लेख किया था कि संचयी मुद्रास्फीतिक दबावों के जोखिम के बीच “घरेलू वित्तीय स्थितियाँ उल्लेखनीय रूप से सख्त हुई हैं जो कि वस्तुतः नीतिगत सख्ती के समान ही है।” जून 2026 की शुरुआती स्थिति के अनुसार, घरेलू वित्तीय बाजारों की प्रवृत्तियाँ यह संकेत देती हैं कि ये स्थितियाँ अभी भी सख्त बनी हुई हैं और इस कारण नीतिगत रेपो दर के माध्यम से अतिरिक्त सख्ती की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
29. भविष्य को अनिश्चित बनाने वाले बहुविध एवं परस्पर अध्यारोपित भू-आर्थिक आघातों को देखते हुए, मेरा मानना है कि मौद्रिक नीति संबंधी प्रतिक्रियाओं में जोखिम प्रबंधन का दृष्टिकोण अपनाना अब सर्वाधिक विवेकपूर्ण है। इस दृष्टिकोण का समर्थन अब अनेक केंद्रीय बैंकों तथा शैक्षणिक अनुसंधानों द्वारा भी किया गया है।
30. मुद्रास्फीति-संवृद्धि संभावना के दोतरफा जोखिमों के कारण नीतिगत त्रुटि की उच्च संभावना बनी हुई है। तथापि, संवृद्धि एवं मुद्रास्फीति के संबंध में एमपीसी के पूर्वानुमानों तथा उच्च एवं बढ़ती हुई मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं को ध्यान में रखते हुए, अब हमें इस बात की कड़ी निगरानी करनी होगी कि निविष्टि-लागतों के द्वितीयक प्रभाव किस सीमा तक खुदरा मुद्रास्फीति में अंतर्निहित हो रहे हैं। यह ऊर्जा आघात की तीव्रता एवं उसकी अवधि पर निर्भर करेगा। अपनी चिंताओं के बावजूद, मैं सावधानीपूर्वक यह उल्लेख करना चाहूँगा कि जून 2026 की स्थिति के अनुसार, मुझे अर्थव्यवस्था की असंतुलित संवृद्धि के कोई संकेत दिखाई दे रहे हैं। अतः, वर्तमान समय में नीतिगत रेपो दर उपयुक्त प्रतीत होती है और जून 2026 की समीक्षा में यथास्थिति बनाए रखना हमारे लिए संभवतः न्यूनतम आर्थिक लागत वाला विकल्प होगा।
31. उपर्युक्त तर्कों के आधार पर, मैं इस बैठक में रेपो दर को अपरिवर्तित बनाए रखने के पक्ष में वोट देता हूँ। समष्टि-वित्तीय परिवेश की परिवर्तनीयता को देखते हुए, यह उपयुक्त भी होगा कि तटस्थ रुख को बनाए रखा जाए।
प्रो. राम सिंह का वक्तव्य
32. एमपीसी की यह बैठक भारतीय अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण दौर में आयोजित हुई है। अत्यधिक अस्थिर बाह्य परिदृश्य के बीच, एक ओर हमें आघात-सह किंतु असमान आर्थिक संवृद्धि को समर्थन प्रदान करना है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते मुद्रास्फीतिक दबावों पर भी नियंत्रण बनाए रखना है।
33. एमपीसी की पूर्ववर्ती बैठकों में किए गए विचार-विमर्श के दौरान मैंने निभावकारी मौद्रिक नीति (एमपी) रुख का समर्थन किया था। मेरा यह दृष्टिकोण स्पष्ट आर्थिक आधारों पर आधारित था। हेडलाइन सीपीआई तथा मूल मुद्रास्फीति दोनों ही अपने संतोषजनक निर्धारित दायरे में थीं, जबकि निजी पूंजीगत व्यय तथा एमएसएमई की कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं को समर्थन प्रदान करना अपेक्षित था। हालांकि, पिछली एमपीसी बैठक के पश्चात पश्चिम एशिया के संघर्ष की निरंतरता तथा उसके प्रभावों के कारण घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति एवं संवृद्धि के मध्य संतुलन संबंधी परिस्थितियों में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं।
34. वर्तमान में, लगातार बनी हुई मुद्रास्फीति, कच्चे तेल एवं अन्य पण्य-कीमतों के वर्धित पूर्वानुमान, वित्तीय बाजारों में अस्थिरता तथा प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों में परिवर्तनशीलता का जटिल मिश्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था में परिलक्षित हो रहा है। अप्रैल एवं मई 2026 के दौरान, एफपीआई ने उभरती इक्विटी बाजारों से निवल रूप से 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की निकासी की, जबकि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की मौद्रिक नीति की भावी दिशा अब भी अनिश्चित बनी हुई है। यूएस फेडरल रिज़र्व के समक्ष सेवाक्षेत्रीय मुद्रास्फीति के उच्च स्तर पर बने रहने की चुनौती तथा आघात-सह श्रम बाजार के कारण वहाँ ब्याज दरों में कटौती संबंधी प्रत्याशाएँ वर्ष 2026 के उत्तरार्द्ध अथवा वर्ष 2027 के प्रारंभ तक स्थगित हो गई हैं। ये सभी बाह्य कारक हमारी घरेलू नीतिगत संभावनाओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं और तदनुसार हमारी नीतिगत प्रतिक्रिया का भी समयानुकूल रूप से बदलते रहना आवश्यक हो जाता है।
35. नीचे, मैं मुद्रास्फीति एवं संवृद्धि से संबंधित हालिया घटनाक्रमों के साथ-साथ उन जोखिम आकलनों का भी उल्लेख कर रहा हूँ, जिन्होंने एमपीसी की इस बैठक के मेरे निर्णयों को मार्गदर्शन प्रदान किया।
मुद्रास्फीति
36. ब्रेंट क्रूड की कीमतें, जो जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान लगभग 67 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, तेज ऊपरी दबाव में आ गई हैं, और 100 डॉलर से काफी ऊपर जाने के बाद 90-100 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में स्थिर हो गई हैं। आरबीआई के विश्लेषण से ऊर्जा की कीमतों और घरेलू मुद्रास्फीति के बीच एक स्पष्ट संबंध रेखांकित होता है: यदि कच्चे तेल की कीमतें आधाररेखा से 10 प्रतिशत अधिक रहती हैं और घरेलू उत्पाद कीमतों में इसका पूर्ण प्रभाव अंतरण माना जाए, तो मुद्रास्फीति लगभग 50 आधार अंक अधिक हो सकती है। कच्चे तेल के आयात बिल में वृद्धि से हमारा सीएडी बढ़ता है।
37. पश्चिमी एशिया अवरोध अब केवल लदान क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं; ये व्यापक व्यापारिक बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं। केप ऑफ गुड होप के चारों ओर लंबे पारगमन समय के कारण एशिया से यूरोप की यात्राओं में लगभग 10 से 14 दिन बढ़े हैं, जिससे मालवाही जहाजों के बीमा प्रीमियम में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। प्रमुख समुद्री मार्गों पर माल ढुलाई दरों में जनवरी 2026 से औसतन 35% की वृद्धि हुई है।1 कच्चे पण्य की आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ी हुई अनिश्चितता के साथ ये कारक कच्चे तेल और उसके उप-उत्पादों से परे पण्य की कीमतों में तेज वृद्धि का कारण बने हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में निविष्टि लागत पर दबाव पड़ने की प्रबल संभावना है। उदाहरण के लिए, मई 2026 में आयातित प्राकृतिक गैस और औद्योगिक धातुओं—विशेष रूप से तांबे और एल्युमीनियम—की कीमतों में वर्ष-दर-वर्ष 12% की वृद्धि दर्ज की गई।
38. युद्ध से प्रभावित कच्चे तेल के आयात बिल और पूंजी खाते के संबंध में हुए विकासों से सीएडी पर पड़ने वाला दबाव, आयातित मुद्रास्फीति के प्रभाव को और बढ़ा सकता है। अप्रैल 2026 तक, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में हुई तेज वृद्धि का घरेलू खुदरा कीमतों पर सीमित प्रभाव- अंतरण पड़ने के कारण ईंधन संबंधी मुद्रास्फीति मामूली बनी हुई है। सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्य से नीचे बनी हुई है। मूल मुद्रास्फीति भी 4% से काफी नीचे है। कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति 2.1-2.2 प्रतिशत की काफी निचली दर पर बनी हुई है, भले ही वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का प्रभाव- अंतरण, वाणिज्यिक एलपीजी, औद्योगिक कच्चे माल, रसायनों, रबर और प्लास्टिक उत्पादों जैसे कई निविष्टियों में दिखाई दे रहा है, फिर भी निविष्टि लागत का दबाव सीपीआई में पूर्ण रूप से प्रतिबिंबित नहीं हुआ है।
39. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, आने वाले आंकड़े सीपीआई मुद्रास्फीति पर उच्च निविष्टि लागत के द्वितीय-चरण के प्रभाव की सीमा को निर्धारित करेंगे। इस समय, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान 5.1 प्रतिशत लगाया गया है, जो तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत की चरम सीमा तक पहुंचने की संभावना है। वर्ष 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान 4.7 प्रतिशत लगाया गया है।
संवृद्धि
40. सेवा क्षेत्र में मजबूत विस्तार और स्थिर रोजगार स्थिति के समर्थन से शहरी मांग मजबूत बनी हुई है। वित्त वर्ष 2026 (वर्ष-दर-वर्ष) के लिए निजी उपभोग में संवृद्धि 7.7% की मजबूत दर पर बनी हुई है। एफएमसीजी बिक्री, यात्री वाहन और ट्रैक्टर बिक्री, घरेलू क्षेत्र को ऋण संवृद्धि, और क्रेडिट कार्ड व्यय जैसे विस्तृत संकेतकों पर हालिया आंकड़े अब तक घरेलू मांग की आघात- सहनीयता को इंगित करते हैं।
41. वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में कई क्षेत्रों, विशेष रूप से स्थावर संपदा और ऊर्जा क्षेत्रों में, निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय में भी सुधार के संकेत दिखाई दिए हैं। निर्यात के संबंध में, सेवा निर्यात मजबूत बने हुए है। वस्तु निर्यातों में अप्रैल 2026 में मूल्य प्रभाव के कारण आंशिक रूप से मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, हालांकि उच्च मालभाड़ा और बीमा लागत निर्यात के लिए बाधक बनी हुई हैं। समग्र रूप से, अर्थव्यवस्था में वित्त वर्ष 2027 में 6.6% की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संवृद्धि दर्ज करने की आशा है।
42. यद्यपि 6.6% की संवृद्धि दर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सर्वोच्च है, यह हमारे हाल के निष्पादन – वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7% – से काफी मंदी को दर्शाती है। इसके अतिरिक्त, जीडीपी के घटकों पर मंडरा रही अनिश्चितता के प्रभाव को देखते हुए मौद्रिक नीति के प्रति सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
43. उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में विनिर्माण संयंत्रों में क्षमता उपयोग 75.2% रहा है, जो दीर्घकालिक औसत (74.0%) से अधिक है और कॉर्पोरेट तुलन पत्र स्वस्थ हैं, फिर भी कॉर्पोरेट सावधान बने हुए हैं। व्यापक रूप से निजी पूंजी निवेश, वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और अनिश्चित वैश्विक मांग सहित बाहरी कारकों से उत्पन्न बढ़ी हुई अनिश्चितताओं से प्रभावित हुआ है। आईआईपी ने अप्रैल 2026 में 4.9% की संवृद्धि दर दर्ज की, जो पिछले वर्ष इसी महीने की 5.7% की संवृद्धि दर से कम है। यह बढ़ते निविष्टि लागत दबावों और, कदाचित इससे भी अधिक महत्वपूर्ण, आपूर्ति श्रृंखलाओं और वैश्विक मांग पर भू-राजनीतिक कारकों के प्रभाव के प्रति जोखिम-से-बचने वाली प्रतिक्रिया को दर्शाता है।
44. यद्यपि अर्थव्यवस्था ने संघर्ष के प्रभाव- विस्तार को अब तक सीमित प्रभाव के साथ सहन कर लिया है, तनाव धीरे-धीरे दृश्यमान होते जा रहे हैं। एल निनो मौसम संबंधी घटना कृषि संवृद्धि और ग्रामीण मांग को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती है। ऐसे वातावरण में, मौद्रिक नीति को निजी निवेश में वृद्धि के साधारण लेकिन प्रोत्साहन संकेतों को कम नहीं करना चाहिए। हमें नीति को सावधानी से बनाना चाहिए जो मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं को अनियंत्रित होने का जोखिम उठाए बिना संवृद्धि को बढ़ावा दे।
45. मेरे विचार से, मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं के अनियंत्रित होने का कोई जोखिम नहीं है। सर्वप्रथम, केंद्र सरकार ने कच्चे तेल की कीमतों का आंशिक और संतारित प्रभाव अंतरण करके खुदरा ऊर्जा कीमतों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित रखा है। अत्यधिक शोधन क्षमता के कारण भारत में पेट्रोलियम उत्पादों के लिए क्रैक स्प्रेड वैश्विक औसत की तुलना में काफी कम है, जिससे पश्चिम एशिया संकट का विभिन्न उद्योग निविष्टियों पर पड़ने वाला प्रभाव सीमित रहता है। इसी प्रकार, केंद्र द्वारा उर्वरक कीमतों को स्थिर रखने का निर्णय कृषि क्षेत्र पर निविष्टि लागत के दबाव को कम करने में सहायक होगा। ये कारक द्वितीय-चरण की कीमत संबंधी प्रभावों को मध्यम करने में सहायक होंगे।
46. इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती प्रतीत हो रही हैं। चूंकि पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष का खर्च संबंधित पक्षों के लिए बढ़ता जा रहा है, इसलिए पक्षों के बीच युद्धविराम की संभावनाएं बढ़ रही हैं; एक ऐसा निष्कर्ष जिसकी पुष्टि कच्चे तेल के फ़्यूचर्स और बॉन्ड बाज़ार के डेटा से होती है। इसके अतिरिक्त, आयातित निविष्टियों (जैसे कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) के घरेलू विकल्पों और महत्वपूर्ण आयात के विविधीकरण ने बाहरी झटकों के प्रति अर्थव्यवस्था की आघात- सहनीयता को मजबूत किया है। साथ ही, मूल मुद्रास्फीति का लगातार निम्न स्तर यह दर्शाता है कि आयातित मुद्रास्फीति और कीमती धातुओं से उत्पन्न होने वाले प्रभावों को छोड़कर, अर्थव्यवस्था में तत्काल कोई व्यापक मांग संबंधी दबाव मौजूद नहीं हैं।2
47. फिर भी, जब तक पश्चिम एशिया में संघर्ष जारी है और एल निनो का प्रभाव अप्रमाणित बना हुआ है, तब तक मौद्रिक नीति के लिए उभरती मुद्रास्फीति और संवृद्धि प्रक्षेपपथ के प्रति प्रतिक्रिया देने हेतु आवश्यक समस्त लचीलापन बनाए रखना उचित है। एक "तटस्थ" रुख मौद्रिक नीति समिति को पूर्व प्रतिबद्धताओं से बंधे बिना अधिकतम परिचालनगत लचीलापन प्रदान करता है। यदि बाहरी झटके और अधिक गंभीर होते हैं या कीमतों के द्वितीय-चरण के प्रभाव व्यापक रूप से फैलते हैं, तो तटस्थ रुख हमें समष्टि आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए नीति में समायोजन करने की अनुमति देता है।
48. मेरी दीर्घकालिक नीतिगत वरीयता संवृद्धि -समर्थक बनी हुई है। मौजूदा नीतिगत रेपो दर 5.25 प्रतिशत और आगामी तिमाहियों के लिए मुद्रास्फीति प्रक्षेपपथ के संयोजन से उत्पन्न वास्तविक ब्याज दरें, संवृद्धि -समर्थक मौद्रिक नीति के अनुकूल हैं। यदि मुद्रास्फीति से जुड़े जोखिम अनुकूल रूप से हल हो जाते हैं—अर्थात् खाद्य मुद्रास्फीति स्थिर बनी रहे, वैश्विक तेल की कीमतें 80 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से नीचे स्थिर हो जाएं, और फेडरल रिज़र्व सख्त (हॉकिश) निर्णयों से बचे—तो मेरे विचार में, मौद्रिक नीति समिति के पास संवृद्धि -समर्थक रुख जारी रखने का अवसर होगा।
49. तदनुसार, इस बैठक में मैं नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने और "तटस्थ" का रुख बनाए रखने के पक्ष में अपना वोट देता हूँ।.
श्री इंद्रनील भट्टाचार्य का वक्तव्य
50. अप्रैल में हुई मौद्रिक नीति के बाद से पश्चिम एशिया संघर्ष का बिना किसी सार्थक समाधान के लंबित रहना, वैश्विक आर्थिक मनोभाव को स्पष्ट रूप से प्रभावित कर चुका है। संघर्ष की यह अनिश्चित गति, जिसमें तीव्रता और शांति के बीच बार-बार उतार-चढ़ाव देखा गया है, ने जोखिम लेने (रिस्क-ऑन) और जोखिम विमुख (रिस्क-ऑफ) के मनोभाव को जन्म दिया है, जिससे अनिश्चितता बढ़ी है और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता आई है। आपूर्ति श्रृंखला में लगातार हो रही बाधाएं और इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में हुई तीव्र वृद्धि अब भारत के आयात बिल और थोक मुद्रास्फीति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है।
51. यद्यपि आपूर्ति की उपलब्धता को सुगम बनाने के लिए सरकार द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप किए जा रहे हैं, तथापि, ऊर्जा की ऊँची कीमतें और लगातार बनी हुईं लॉजिस्टिक चुनौतियाँ घरेलू संवृद्धि की संभावनाओं के लिए जोखिम बनी हुई हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून में अनुमानित कमी, कृषि गतिविधियों और ग्रामीण मांग पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है, हालाँकि कृषि क्षेत्र में चल रही कई सरकारी पहलें3 इस प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकती हैं। उद्योग क्षेत्र में उच्च क्षमता उपयोग और ऋण की तेज़ मांग, निवेश के लिए अनुकूल संकेत देती है। सेवा निर्यात में गति बनी रहने की उम्मीद है, हालांकि कमज़ोर वैश्विक मांग और बढ़ी हुई माल ढुलाई एवं बीमा लागत के कारण पण्य निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संवृद्धि को अप्रैल 2026 में किए गए 6.9 प्रतिशत के पूर्वानुमान से 30 आधार अंक (बीपीएस) घटाकर समायोजित किया गया है।
52. अप्रैल में हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति 3.5 प्रतिशत रही, जो 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे बनी हुई है। इसके अतिरिक्त, मार्च और अप्रैल में सीपीआई मूल मुद्रास्फीति की गति क्रमशः 0.2 प्रतिशत और 0.3 प्रतिशत रही, जो यह संकेत देती है कि ऊर्जा मूल्यों में आए झटकों और आपूर्ति में कमी का प्रभाव मूल मुद्रास्फीति में अभी तक प्रतिबिंबित नहीं हुआ है। हालाँकि, डबल्यूपीआई मुद्रास्फीति मार्च में 3.9 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में तेज़ी से 8.3 प्रतिशत हो गई, जो मुख्य रूप से ऊर्जा और अन्य औद्योगिक निविष्टि मूल्यों में वृद्धि के कारण थी। यद्यपि लागत-प्रेरित दबाव अभी तक खुदरा मुद्रास्फीति में परिलक्षित नहीं हुए हैं, फिर भी विलंबित लेकिन उच्च स्तर की आगे की संभावना, प्रतिकूल मौसम और मानसून के पूर्वानुमान, मुद्रास्फीति की संभावना को आकार दे रहे हैं। तदनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान अप्रैल की मौद्रिक नीति की तुलना में 50 आधार अंक में संशोधित करके 5.1 प्रतिशत किया गया है। यह संशोधन मुख्य रूप से वर्ष 2026-27 के दौरान तेल की औसत कीमतों में वृद्धि की धारणा और आईएमडी द्वारा दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य से कम वर्षा की संभावना के अनुमान के कारण किया गया है।
53. लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण एक ऐसा ढांचा है जिसे सर्वोत्तम रूप से सीमित विवेक के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जिसमें मौद्रिक नीति एक संख्यात्मक लक्ष्य से आबद्ध रहते हुए भी झटकों को समायोजित करने की गुंजाइश बनाए रखती है। यह लचीलापन उच्च अनिश्चितता की अवधियों के दौरान विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। सहनशीलता अंतराल सीमित विवेक का एक घटक है – लक्ष्य सीमाएँ, और कुछ मामलों में, सहनशीलता बैंड, बिंदु लक्ष्यों की तुलना में मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं पर अंकुश लगाने में सहायक हो सकते हैं।4 इसके अतिरिक्त, नीतिगत विवेकाधिकार का अधिक प्रयोग लक्ष्य अवधि पर किया जा रहा है। 1990 से, 26 मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण केंद्रीय बैंकों से प्राप्त साक्ष्य दर्शाते हैं कि यद्यपि लक्ष्य का कड़ाई से पालन अभेद्य हो गया है, फिर भी मुद्रास्फीति लंबी अवधि में लक्ष्य की ओर अभिसरण करती है।5
54. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मुद्रास्फीति के अनुमान कई अनिश्चितताओं के अधीन हैं। यद्यपि डबल्यूपीआई मुद्रास्फीति में तेज़ी आई है, तथापि इसका सीपीआई मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए प्रतीक्षा करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, फसल की संभावनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानसून का स्थानिक और कालिक वितरण अभी ज्ञात नहीं है। अनुमानित एल नीनो स्थितियों का प्रभाव भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) की स्थिति पर निर्भर है, जो इस प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकता है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने पहले ही अपर्याप्त मानसून के प्रभाव को कम करने के लिए कई उपाय किए हैं। जबकि मांग-जनित मुद्रास्फीति को रोकने के लिए मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं को प्रभावी ढंग से स्थिर करने हेतु पूर्वक्रीत कार्य की आवश्यकता हो सकती है, आपूर्ति झटकों के कारण उत्पन्न लागत-जनित मुद्रास्फीति के मामले में नीति निर्माण में अधिक सावधानी – अर्थात क्रमिकता बरतने की आवश्यकता है। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, मेरा मत है कि किसी भी नीतिगत कार्रवाई का निर्णय लेने से पहले आंकड़ों से अधिक स्पष्टता उभरने की प्रतीक्षा करना उचित होगा। तदनुसार, मैं नीतिगत दर में परिवर्तन न करने और तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्ष में वोट देता हूं।
डॉ पूनम गुप्ता का वक्तव्य
55. अप्रैल 2026 में हुई पिछली नीति घोषणा के बाद से वैश्विक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। यद्यपि विभिन्न देशों ने ऊर्जा और अन्य संबंधित उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपाय खोज लिए हैं, तथापि, उन्होंने अपने कार्यनीतिक भंडार को भी कम कर लिया है और वे लगातार बढ़ती ऊर्जा लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल रहे हैं।
56. भारत ने भी चल रहे झटके से निपटने के लिए कुछ इसी प्रकार की कार्यनीति अपनाई है। विविध स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित की गई है, हालांकि यह उच्चतर कीमतों पर हुई है, जिसमें बढ़ती लदान और बीमा लागत तथा विनिमय दर में गिरावट का संयुक्त प्रभाव भी शामिल है। कीमतों में वृद्धि का आंशिक बोझ उपभोक्ताओं पर अंतरित किया गया है।
57. इन गतिविधियों के परिणामस्वरूप हमने अपनी संवृद्धि और मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमानों में संशोधन किया है। हमें मौद्रिक नीति रिपोर्ट (अप्रैल 2026) में रेखांकित वैकल्पिक परिदृश्य के अधिक निकट आना पड़ा है, जिसमें कच्चे तेल की कीमतें लगभग 95 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल मानी गई हैं। अब 2026-27 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संवृद्धि 6.6 प्रतिशत तक धीमा होने की संभावना है, जबकि औसत हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़कर 5.1 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। संवृद्धि दर में गिरावट 2026-27 की दूसरी तिमाही में सबसे अधिक तीव्र रहने का अनुमान है, जिसके बाद अंतिम तिमाही में सुधार होने की संभावना है। मुद्रास्फीति में तीव्रतम वृद्धि तीसरी तिमाही में होने का अनुमान है, जिसके बाद अंतिम तिमाही में कुछ कमी आ सकती है। मुद्रास्फीति में अनुमानित तेज़ी का बड़ा हिस्सा ईंधन और खाद्य घटकों तक सीमित है, जिसका कुछ प्रभाव निविष्टि लागत चैनल के माध्यम से मूल मुद्रास्फीति पर भी पड़ने की संभावना है।
58. समग्र रूप से, भारतीय अर्थव्यवस्था आघातों के बावजूद मजबूती से टिकी हुई प्रतीत होती है: प्रणाली में पर्याप्त चलनिधि उपलब्ध है; ऋण वृद्धि लगभग 16 प्रतिशत की मजबूत गति से जारी है; अधिकांश क्षेत्रीय संभावनाएं और उच्च आवृत्ति वाले संकेतक स्थिर बने हुए हैं; तथा समग्र समष्टि आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता बनी हुई है। आईएमएफ के नवीनतम राजकोषीय मॉनिटर ने भारत को उस अर्थव्यवस्था के रूप में रेखांकित किया है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में सार्वजनिक ऋण का अनुपात आने वाले कुछ वर्षों में घटने का अनुमान है, जिसका आधार उच्च नाममात्र जीडीपी संवृद्धि, राजकोषीय समेकन और व्यय की बेहतर संरचना है।
59. इन गतिविधियों से मौद्रिक नीति को कैसे मार्गदर्शन मिलना चाहिए? मेरा मानना है कि नीति चक्र को उलटने पर निर्णय लेने से पहले, आने वाले महीनों में वैश्विक तथा मौसम संबंधी अनिश्चितताओं के परिणाम स्पष्ट होने तक थोड़ी और प्रतीक्षा करनी चाहिए।
60. इसके दो कारण हैं। सर्वप्रथम, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जबकि संवृद्धि दर में मंदी की संभावना है और मुद्रास्फीति अभी तक स्थिर नहीं हुई है, मुद्रास्फीति या मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं को नियंत्रित करने हेतु मौद्रिक नीति को कसने का कोई औचित्य नहीं दिखता है। वस्तुतः, ऐसा करने से चल रहे आपूर्ति झटके के कारण उत्पन्न आर्थिक कष्ट और भी तीव्र हो सकता है।
61. दूसरा, एक बार जब पश्चिम एशिया संघर्ष का समाधान हो जाता है, तो भारत के साथ-साथ वैश्विक संभावना भी तेजी से सुधर सकता है, जिससे मुद्रास्फीति और संवृद्धि की गतिशीलता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता उत्पन्न होगी। अतः, शीघ्र या पूर्व-निर्धारित नीतिगत बदलाव करने के बजाय प्रतीक्षा और निगरानी की नीति अपनाना उचित होगा।
62. अतः, मैं यथास्थिति के पक्ष में वोट देता हूँ, अर्थात् नीतिगत रेपो दर को अपरिवर्तित 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का समर्थन करता हूँ। मैं नीतिगत रुख को तटस्थ बनाए रखने का भी प्रस्ताव रखता हूँ, जिसका संकेत यह है कि नीतिगत कार्रवाई की भविष्य की दिशा आंकड़ों पर निर्भर होनी चाहिए।
श्री संजय मल्होत्रा का वक्तव्य
63. समग्र रूप से, हमारी आर्थिक स्थिति अपने कई समकक्ष देशों की तुलना में काफी मजबूत और स्वस्थ है। न केवल वर्तमान आर्थिक झटके के संदर्भ में, बल्कि पूर्व में आए सभी झटकों की तुलना में भी हम आज बेहतर स्थिति में हैं। हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं, और पिछले एक वर्ष में हमारी मुद्रास्फीति स्थिर और नियंत्रित रही है।
64. यद्यपि हेडलाइन मुद्रास्फीति लक्ष्य के भीतर बनी हुई है, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान अब लक्ष्य से अधिक 5.1 प्रतिशत लगाया गया है। वर्ष 2026-27 के लिए मुद्रास्फीति की बढ़ती प्रवृत्ति, तीसरी तिमाही में अधिकतम 5.9 प्रतिशत रहने की संभावना है,जो 6 प्रतिशत की ऊपरी सहनशीलता सीमा के निकट रहेगी, मौद्रिक नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता का संकेत दे सकती है। तथापि, मैं निम्नलिखित कारणों से प्रतीक्षा और निगरानी रखना चाहूँगा।
65. एक तो, मुद्रास्फीति और संवृद्धि के पूर्वानुमानों के लिए अपनाई गई धारणाओं में कई कारणों–यथा संघर्ष की अवधि और आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, मानसून की तीव्रता और भौगोलिक व्याप्ति तथा ऊर्जा, खाद्य और अन्य पण्य वस्तुओं की कीमतों पर इसका प्रभाव, से उच्च अनिश्चितता है।
66. दूसरा, यद्यपि हेडलाइन मुद्रास्फीति का मुद्रास्फीति सहनशीलता बैंड के उच्च पक्ष में रहने का अनुमान है, वर्ष 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति, 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कीमती धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति लक्ष्य से भी कम है।
67. तीसरा, अप्रैल की मौद्रिक नीति और वर्तमान के बीच पूर्वानुमानित हेडलाइन मुद्रास्फीति में हुई अधिकांश वृद्धि, खाद्य और ईंधन से संचालित है, जो कि आपूर्ति-जनित है। यह कीमत स्तर में परिवर्तन हो सकता है, जो सामान्यीकृत हो भी सकता है और नहीं भी।
68. चौथा, यद्यपि मौद्रिक नीति के लिए मुद्रास्फीति संभावना अधिक प्रासंगिक है, वर्तमान मुद्रास्फीति पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, विशेष रूप से जब संभावना अनिश्चित हो। अप्रैल में हेडलाइन मुद्रास्फीति लक्ष्य के भीतर बनी हुई है। मुद्रास्फीति में देखी गई अधिकांश वृद्धि, उच्च खाद्य मुद्रास्फीति के कारण है। मूल मुद्रास्फीति भी नियंत्रित रही, जो यह संकेत देती है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव मंद बने रहे।
69. यह कहने के बाद भी, हमें मुद्रास्फीति प्रक्षेपपथ पर सतर्क रहने की आवश्यकता है। भविष्य में, मई में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में संशोधन के परिणामस्वरूप आगामी महीनों में ईंधन मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी। यद्यपि अच्छी रबी फसल और पर्याप्त स्टॉक के कारण, खाद्य मूल्यों की निकट अवधि संभावना अनुकूल बनी हुई है, लेकिन विशेष रूप से आईएमडी द्वारा सामान्य से कम मानसून की भविष्यवाणी और संभावित एल निनो स्थितियों के कारण जोखिम बढ़ गए हैं। अप्रैल में की गई धारणाओं की तुलना में कच्चे तेल की औसत कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है; अप्रैल में डबल्यूपीआई ऊंचा रहा है; परिणामस्वरूप, उच्च ऊर्जा और अन्य निविष्टि मूल्यों से उत्पन्न लागत दबाव, मूल मुद्रास्फीति में भी समाहित हो सकते हैं। अतः, हम आंकड़ों पर निर्भर रहना जारी रखेंगे और इस बात के प्रति सतर्क रहेंगे कि कहीं मुद्रास्फीति सामान्यीकृत न हो जाए, जिससे मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाएँ अस्थिर हो सकती हैं।
70. संक्षेप में, मैं "इंतज़ार करो और देखो" वाला दृष्टिकोण अपनाना उचित समझता हूँ। तदनुसार, मैं नीतिगत रेपो दर में यथास्थिति बनाए रखने और तटस्थ रुख को जारी रखने के पक्ष में वोट करता हूँ। आगामी महिनों में मुद्रास्फीति के व्यापक होने की संभावना के प्रति हमें सतर्क और सावधान रहना चाहिए।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/497
|