617 भाषण - भारतीय रिज़र्व बैंक

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का लोगो

भाषण

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बिज़नेस स्टैंडर्ड बीएफएसआई इनसाइट समिट की 21 दिसंबर, 2022 को मुंबई में आयोजित ‘फायरसाइड चैट’ में गवर्नर की बातचीत (संपादित अंश)

तमाल बंद्योपाध्याय:

इस 'फायरसाइड चैट' में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। सर, मैं थोड़ा घबराया हुआ हूँ। आप हमेशा एक अलग तरह की टाई पहनते हैं। आपको किस ब्रांड की टाई पसंद है?

शक्तिकांत दास:

यह मौसम के हिसाब से बदलती रहती है, और एक केंद्रीय बैंक को हर मौसम के लिए तैयार रहना चाहिए।

तमाल बंद्योपाध्याय:

किसी ने मुझसे कहा था कि अगर आप किसी से बात करना चाहते हैं और उन्हें सहज महसूस कराना चाहते हैं, तो टाई के बारे में बात करना शुरू कर दें। एसएसबीसी इंडिया के सीईओ श्री दवे यहाँ बैठे हैं। वह मुझे हर तरह के मुश्किल सवाल पूछने के लिए उकसा रहे थे। श्री दवे, आपको अंदाज़ा नहीं है कि श्री दास कितने बेहतरीन कम्युनिकेटर हैं। पिछले रविवार को वर्ल्ड कप था। बस एक पल के लिए, आप सोचिए कि हम जिओ(Jio) ग्लोबल सेंटर में नहीं, बल्कि कतर के लुसैल स्टेडियम में हैं। अगर ऐसा है, तो बस यह सोचिए कि मैं सेंट्रल बैंकिंग के मैदान पर मेस्सी का सामना कर रहा हूँ।

शक्तिकांत दास:

मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन क्या मेस्सी ने भी इतिहास में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया था? लोग कभी-कभी मुझे याद दिलाते रहते हैं कि मैंने इतिहास की पढ़ाई की है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

लेकिन आपका काम और आपकी नीतियाँ आपके बारे में खुद बोलती हैं।

शक्तिकांत दास:

अब ज़रा गंभीरता से बात करें, चलिए आगे बढ़ते हैं।

तमाल बंद्योपाध्याय:

मुझे याद है, पिछले साल नवंबर में, हमने आपके साथ एक 'फायरसाइड चैट' की थी, जो भारतीय रिज़र्व बैंक की 18वीं मंज़िल पर हुई थी। उस समय आपने क्रिप्टोकरेंसी के खिलाफ़, अगर मैं कह सकूँ तो, एक तरह के 'युद्ध' की बात बहुत ज़ोरदार ढंग से कही थी। तो, क्या आपको लगता है कि आपने वह लड़ाई जीत ली है? क्योंकि वित्त मंत्रालय तो हाल तक इस मामले में थोड़ा दुविधा में ही था। तो, क्या क्रिप्टोकरेंसी के खिलाफ़ वह युद्ध अब खत्म हो गया है? क्या आपको लगता है कि आप उसमें विजेता रहे हैं?

शक्तिकांत दास:

नहीं, कोई युद्ध या वैसी कोई चीज़ नहीं है। हमें तब भी पूरा भरोसा था और अब भी पूरा भरोसा है कि क्रिप्टोकरेंसी का कोई भी 'अंडरलाइंग'(मूल आधार) बिल्कुल नहीं है। क्रिप्टोकरेंसी में हमारी मैक्रोइकोनॉमिक और वित्तीय स्थिरता के लिए कुछ बड़े अंतर्निहित जोखिम हैं। हम पिछले एक साल से इस बात और इसके घटनाक्रमों की ओर इशारा करते रहे हैं, जिसमें एफटीएक्स से जुड़ा हालिया मामला भी शामिल है। हमें अपने रुख के बारे में और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। समय ने साबित कर दिया है कि क्रिप्टोकरेंसी की कीमत आज उतनी ही है,जितनी वह है। कुछ अनुमानों के अनुसार, क्रिप्टोकरेंसी का कुल मूल्य लगभग 180 अरब अमेरिकी डॉलर था, लेकिन अब यह घटकर लगभग 140 अरब अमेरिकी डॉलर या उसके आसपास आ गया है,और लगभग 40 अरब अमेरिकी डॉलर का मूल्य वास्तव में खत्म हो गया है। किसी भी उत्पाद के मूल्य में बदलाव बाजार का एक कार्य है, लेकिन किसी भी अन्य संपत्ति या उत्पाद के विपरीत, क्रिप्टो के बारे में हमारी मुख्य चिंता यह है कि इसका कोई भी 'अंडरलाइंग'(मूल आधार) बिल्कुल नहीं है। 'क्रिप्टोकरेंसी' या 'निजी क्रिप्टोकरेंसी' शब्द, उस चीज़ का वर्णन करने का एक फैशनेबल तरीका है, जो अन्यथा 100 प्रतिशत सट्टेबाजी वाली गतिविधि है। इस बात की चर्चा है कि इसे विनियमित किया जाना चाहिए। इसे कैसे विनियमित किया जाए? किसी को यह समझाने की ज़रूरत है। मैं तीन बातें बताना चाहूंगा। पहली बात,

क्रिप्टोकरेंसी-या निजी क्रिप्टोकरेंसी-की उत्पत्ति ही व्यवस्था को दरकिनार करने, व्यवस्था को तोड़ने के लिए हुई है। वे केंद्रीय बैंक की मुद्रा में विश्वास नहीं करते; वे विनियमित वित्तीय दुनिया में विश्वास नहीं करते। वे व्यवस्था को दरकिनार करना और उसे मात देना चाहते हैं। दूसरी बात, इनका कोई भी 'अंडरलाइंग'(मूल आधार) बिल्कुल नहीं है। इतना ही नहीं, मैंने अभी तक कोई भी विश्वसनीय तर्क नहीं सुना है कि यह किस सार्वजनिक भलाई या किस सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा करता है। इस बारे में अभी भी कोई स्पष्टता नहीं है। तीसरी बात, यह 100 प्रतिशत सट्टेबाजी वाली गतिविधि है। मेरा अब भी यही मानना है कि इसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अलग-अलग देशों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा विचार है कि इसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। यदि आप इसे विनियमित करने की कोशिश करते हैं और इसे बढ़ने देते हैं, तो कृपया मेरी बातें ध्यान से सुनें -अगला वित्तीय संकट निजी क्रिप्टोकरेंसी से ही आएगा।

तमाल बंद्योपाध्याय:

आप वही बात दोहरा रहे हैं जो आपने पहले कही थी। मेरे पास कई सवाल हैं। मैं सिर्फ़ जीडीपी और महंगाई पर ही बात नहीं करना चाहता। तो, कुछ अलग बात करते हैं। आपने सीबीडीसी प्रायोगिक परियोजनाएं(पायलट प्रोजेक्ट) शुरू की हैं। क्या आप हमें बहुत संक्षेप में समझा सकते हैं कि सीबीडीसी का क्या फ़ायदा है? आपने कहा कि यह एक करेंसी है, यह करेंसी नोटों जैसी ही है और यह गुमनाम है। लेकिन इसमें नया क्या है? मैं यूपीआई वगैरह इस्तेमाल करके खुश हूँ, तो मैं सीबीडीसी पर क्यों जाऊँ? क्या यह सिर्फ़ क्रिप्टो से मुकाबला करने का एक दिखावा है,या अगर यहाँ लोग रिटेल के लिए सीबीडीसी का इस्तेमाल करते हैं, तो इसमें मेरे लिए कुछ सचमुच फ़ायदेमंद भी है?

शक्तिकांत दास:

मौद्रिक नीति वक्तव्य(मॉनेटरी पॉलिसी स्टेटमेंट) के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में, मैंने यूपीआई और सीबीडीसी के बीच का फ़र्क समझाया था। पहला फ़र्क यह है कि यूपीआई एक पेमेंट सिस्टम है, जबकि सीबीडीसी खुद एक करेंसी है। दूसरा, यूपीआई में बैंकों की मध्यस्थता शामिल होती है; आप किसी को मोबाइल से भुगतान करते हैं, तो वह संदेश बैंक के पास जाता है, आपके खाते से पैसे कटते हैं, बैंक वह पैसा पाने वाले के बैंक खाता में अंतरित करता है, और पाने वाले का बैंक खाता एक संदेश भेजता है कि उसे इतने पैसे मिल गए हैं। तो, इसमें बैंक की मध्यस्थता होती है। सीबीडीसी करेंसी नोटों की तरह है। आप बैंक जाते हैं, पैसे निकालते हैं, उन्हें अपने पर्स में रखते हैं और खर्च करते हैं। सीबीडीसी की एक और खासियत यह है कि इसमें ऑटोमैटिक 'स्वीप-इन' और 'स्वीप-आउट' की सुविधा है। आप 24 घंटे सीबीडीसी निकाल सकते हैं, और अगर आपके पास ज़रूरत से ज़्यादा सीबीडीसी है, तो आप उसे वापस अपने बैंक खाता में डाल सकते हैं। तो, इसमें ऑटोमैटिक 'स्वीप-इन' और 'स्वीप-आउट' की सुविधा है।

तीसरा फ़ायदा है लॉजिस्टिक्स का - नोट छापने का जो भारी-भरकम खर्च होता है, वह इसमें नहीं है। कागज़ बनाना,स्याही मंगाना,और प्रिंटिंग प्रेस रखना- ये सारी चीज़ें समय के साथ पुरानी हो जाएँगी। लॉजिस्टिक्स के लिहाज़ से, सीबीडीसी कहीं ज़्यादा आसान होगा,और यह कहीं ज़्यादा तेज़ भी होगा। अगला बिंदु अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए है। जब दो देशों के पास अपनी-अपनी सीबीडीसी होती हैं, तो एक देश से दूसरे देश में तुरंत पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं। पूरी दुनिया ज़्यादा से ज़्यादा डिजिटल होती जा रही है। आज लगभग हर क्षेत्र में डिजिटल गतिविधियाँ हो रही हैं। कई केंद्रीय बैंक अभी भी प्रयोगात्मक चरण में हैं। वे अभी भी विश्लेषण कर रहे हैं। कुछ केंद्रीय बैंकों ने प्रयोगिक परियोजनाएं शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि ज़्यादा से ज़्यादा केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी अपनाएँगे और इस सदी में डिजिटल क्रांति में भारत सबसे आगे रहा है। यह पीछे छूट जाने के डर का सवाल नहीं है, न ही यह किसी प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी को टक्कर देने का सवाल है; बल्कि यह इस बात का सवाल है कि दुनिया कैसे आगे बढ़ेगी और आने वाले दिनों और सालों में डिजिटल दुनिया कैसे आकार लेगी, और हमें इसके लिए तैयार रहना होगा। इसलिए यह भविष्य की करेंसी है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

सर, आपने कहा कि आप इतिहास के छात्र हैं, लेकिन मैं आपसे अर्थशास्त्र के बारे में पूछने की गुस्ताखी करना चाहूँगा, जिसके बारे में आप कई अर्थशास्तरियों से बेहतर जानते हैं। भारत बाकी दुनिया से कितना अलग है? अमरीकी फेडरल रिज़र्व कब तक 'बिग डैडी' बना रहेगा? हम चाहें या न चाहें, हमारी नज़रें एफओएमसी की मीटिंग पर टिकी रहती हैं। एमपीसी के एक या दो सदस्य असहमति जता सकते हैं, लेकिन सामूहिक रूप से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और एमपीसी की नज़रें - जैसा कि आप 'अर्जुन की नज़र' वाला मुहावरा इस्तेमाल करते हैं - इस बात पर टिकी रहती हैं कि एफओएमसी क्या कर रहा है, क्या वह रफ़्तार धीमी कर रहा है, वगैरह; तो क्या इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है?

शक्तिकांत दास:

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते, ज़ाहिर है यूएस फेड जो भी करता है, वह हर किसी के लिए मायने रखता है और वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा भी डॉलर में ही होता है। इसलिए, यूएस फेड जो भी करता है, वह निश्चित रूप से हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है। जहाँ तक हमारी मौद्रिक नीति बनाने और अन्य निर्णयों का सवाल है, हम मुख्य रूप से अपनी घरेलू मुद्रास्फीति-विकास की गतिशीलता और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय कारकों से निर्देशित होते हैं। यूएस फेड के कार्यों पर विचार किया जाता है और उनका अध्ययन भी किया जाता है, लेकिन यह केवल एक कारक है। ऐसा नहीं है कि फेड कुछ करे और हमें भी उसी राह पर चलना पड़े। मैंने पहले भी कहा है कि हमारी मौद्रिक नीतियाँ मुख्य रूप से हमारी घरेलू विकास-मुद्रास्फीति की गतिशीलता से ही संचालित और निर्देशित होती हैं। यूएस फेड के कार्यों का हमारी घरेलू स्थिति पर असर ज़रूर पड़ता है, क्योंकि अगर वे अपनी नीति में सख्ती लाते हैं - मान लीजिए, डॉलर मज़बूत होता है- तो ज़ाहिर है हमारे आयातित सामानों की कीमतें बढ़ जाएँगी। कोई किसी का 'बिग डैडी' नहीं है। आज की दुनिया में, हर किसी की अपनी एक जगह है। 'बिग डैडी' और इस तरह की बातें तो 19वीं सदी की हैं; अब ऐसा बिल्कुल नहीं है। लेकिन हाँ, यूएस एक बहुत बड़ा खिलाड़ी है। मैं फिर से दोहराना चाहूँगा कि हम मुख्य रूप से अपने घरेलू कारकों से ही निर्देशित होते हैं। जब मैं यह बात कहता हूँ, तो मेरा मतलब यही होता है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

आपने यहाँ दो शब्दों का ज़िक्र किया है—मुद्रास्फीति और विकास। लगातार 10 महीनों तक भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रास्फीति को तय सीमा के भीतर रखने में नाकाम रहा, हालाँकि इसमें कुछ भी नया नहीं है - यह बात हर कोई जानता है - और जब हम इस पर बात कर रहे हैं, तब तक यह मुद्रास्फीति तय सीमा के भीतर आ चुकी है। फिर भी, ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो अक्सर आरबीआई का मुद्रास्फीति का अनुमान सही नहीं बैठता; असल मुद्रास्फीति आरबीआई के अनुमान से कहीं ज़्यादा होती है। तो क्या हमें मुद्रास्फीति की संरचना पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है? या फिर ऐसा हो सकता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक को ही मुद्रास्फीति के अपने आकलन पर दोबारा गौर करने की ज़रूरत हो? आख़िर हम अभी किस स्थिति में हैं?

शक्तिकांत दास:

हम लगातार अपने महंगाई के अनुमान वाले मॉडल्स को बेहतर बनाते रहते हैं। कोई भी अनुमान, चाहे वह महंगाई का हो या ग्रोथ का, किसी भी केंद्रीय बैंक द्वारा - सिर्फ़ रिज़र्व बैंक ही नहीं - हमेशा कई कारकों पर निर्भर करता है। अब,अगर बुनियादी हालात बदल जाते हैं या वैसे नहीं होते जैसा आपने सोचा था, तो ज़ाहिर है आंकड़े अलग होंगे। हालाँकि, पिछले कुछ आंकड़ों में महंगाई और

विकास दोनों पर हमारी उम्मीदें, हम लगभग दूसरे दशमलव या पहले दशमलव तक - अगर दूसरा नहीं तो पहला - सही पा रहे हैं। दूसरी तिमाही में विकास का हमारा अनुमान 6.3% था, और हमें 6.3% ही मिला। महंगाई का पिछला आंकड़ा, जो 5.88% पर आया था, नवंबर के लिए हमारा अनुमान उससे लगभग 20 या 30 आधार अंक ज़्यादा था। तो अचानक कुछ घटनाएँ हो जाती हैं। हम

अपने मॉडल को लगातार बेहतर बनाते रहते हैं। महंगाई के अनुमान के संदर्भ में देखने वाली ज़रूरी बात यह नहीं है कि आपका आंकड़ा सही आ रहा है या नहीं, बल्कि मुख्य रूप से यह है कि क्या आप महंगाई की दिशा का सही अनुमान लगा पा रहे हैं। न सिर्फ़ दिशा, बल्कि दिशा की गति भी। क्या हम सही ढंग से यह पढ़ पा रहे हैं कि महंगाई बहुत तेज़ी से ऊपर जाएगी या बहुत धीरे-धीरे? तो, यह महंगाई के उतार-चढ़ाव की दिशा और गति है - चाहे वह नीचे जा रही हो,ऊपर जा रही हो,या उसमें अस्थिरता हो - जो मायने रखती है; सिर्फ़ आंकड़ा सही आना ही काफ़ी नहीं है,क्योंकि मौद्रिक नीति महंगाई की दिशा,उसकी व्यापक गति,और उसके बढ़ने या घटने पर आधारित होती है। हम इस आधार पर नहीं चलते कि महंगाई 6.34% या 6.48% या कुछ इसी तरह का आंकड़ा होगी।

तमाल बंद्योपाध्याय:

तो, विकास की बात करें तो गवर्नर साहब आप काफ़ी सतर्क लग रहे हैं। असल में, विकास के अपने ताज़ा आकलन में, आपने इसे थोड़ा कम कर दिया है, जबकि विश्व बैंक का आकलन इससे ज़्यादा है। अचानक इतनी सतर्कता क्यों? आम तौर पर, आप इतने ज़्यादा आशावादी नहीं दिखते।

शक्तिकांत दास:

विश्व बैंक ने अपने ताज़ा अनुमान में, मौजूदा साल के लिए 6.9% की ग्रोथ का अनुमान लगाया है। हमने 6.8% का अनुमान दिया है। इसकी मुख्य वजह वैश्विक चुनौतियाँ हैं। यूरोप और दूसरे बड़े देश विकास में बहुत गंभीर सुस्ती का सामना कर रहे हैं। पाँच महीने पहले, वैश्विक मंदी की चर्चा कहीं ज़्यादा ज़ोरों पर थी। अब, मंदी को लेकर बनी उम्मीदें थोड़ी नरम पड़ी हैं, लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में मंदी का डर या विकास में सुस्ती की हकीकत साफ़ तौर पर दिखाई दे रही है। ये बाहरी माँग पर असर डालेंगे, और बाहरी माँग हमारे विकास की गणना में हमारे निर्यात निष्पादन आदि के ज़रिए काफ़ी योगदान देती है। इसलिए, मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कारक - हर तरफ विकास में सुस्ती और दुनिया भर में वित्तीय स्थितियों का सख़्त होना - ये सभी बाहरी कारक घरेलू विकास के माहौल पर असर डालेंगे, लेकिन भारत में बुनियादी आर्थिक गतिविधियाँ मज़बूत बनी हुई हैं। ज़्यादातर तेज़ी से बदलने वाले संकेतक – आरबीआई ऐसे लगभग 70 संकेतकों पर नज़र रखता है - पिछले महीने 'ग्रीन बॉक्स' में थे। इसका मतलब है कि वे सभी ऊपर की ओर जा रहे हैं और उनमें अभी भी विकास हो रहा है, लेकिन बाहरी कारक महत्वपूर्ण हैं और वे हमारी अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक प्रभावित करेंगे। इसलिए, हमने इन पहलुओं पर विचार किया है और इसी वजह से हमने 6.8% का अनुमान अपनाया है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

कल जारी हुए ताज़ा बुलेटिन में भी ठीक वही बात कही गई है जो आप कह रहे हैं। तो,चलिए मैक्रो से माइक्रो की ओर बढ़ते हैं। यहाँ बैठे ये सभी सज्जन, जो भारतीय बैंकिंग के एक बड़े हिस्से - विदेशी, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों - का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, आपके विचार सुनना चाहेंगे। जिस तरह की क्रेडिट ग्रोथ हम साल-दर-साल देख रहे हैं, क्या वह टिकाऊ है? क्या आपको लगता है कि ये सज्जन आगे आने वाली मुश्किलों के बीज बो रहे हैं? क्या हम फिर से 'बैड लोन' (खराब कर्ज़) के जाल में फँस जाएँगे, या आपको लगता है कि भारतीय वित्तीय प्रणाली और बैंकर अब जोखिम प्रबंधन, अंडरराइटिंग वगैरह को अच्छी तरह समझते हैं? वैसे, हमें निजी बैंकरों से सुनने को मिलता है कि जोखिम की कीमत ठीक नहीं है और शायद हम कुछ ज़्यादा ही आगे बढ़ रहे हैं। क्या आप इस बारे में चिंतित हैं, या सब ठीक है?

शक्तिकांत दास:

इसके दो पहलू हैं। पहला, 17.5% की क्रेडिट ग्रोथ – 2 दिसंबर तक के ताज़ा आँकड़े – हमारी अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार को दर्शाते हैं। पिछले दो सालों में क्रेडिट वृद्धि बहुत मामूली थी। कोविद के पहले साल में, क्रेडिट वृद्धि सिर्फ़ 6% के आस-पास थी; दूसरे साल में, यह थोड़ी बेहतर थी। इसलिए, मौजूदा 17.5% की वृद्धि पिछले दो सालों के कम आधार पर आधारित है। यहाँ 'बेस इफ़ेक्ट' भी अपनी भूमिका निभा रहा है। दूसरा, मौजूदा क्रेडिट वृद्धि अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार को दर्शाती है, और यह पिछले दो सालों में क्रेडिट की रुकी हुई माँग का भी एक संकेत है। इसलिए, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, मौजूदा समय में क्रेडिट वृद्धि निश्चित रूप से उस स्थिति से बहुत दूर है जिसे आप 'अत्यधिक उत्साह' या कुछ ऐसा ही कह सकते हैं। यह निश्चित रूप से बहुत स्थिर है। हम इस पर बहुत बारीकी से नज़र रख रहे हैं। इस संदर्भ में, मैं एक बात और कहना चाहूँगा – क्योंकि किसी भी सार्वजनिक चर्चा में यह सवाल बार-बार उठता है कि डिपॉज़िट (जमा) नहीं बढ़ रहे हैं जबकि क्रेडिट बढ़ रहा है, तो क्या हम किसी ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जो लंबे समय तक कायम नहीं रह पाएगी? मैं इस बात से सहमत हूँ कि मध्यम या लंबी अवधि में क्रेडिट वृद्धि को बनाए रखने के लिए डिपॉज़िट का बढ़ना ज़रूरी है, लेकिन कुछ तथ्यों को भी ध्यान में रखना होगा। पिछले साल के कम आधार के कारण क्रेडिट वृद्धि बहुत ज़्यादा दिख रही है। पिछले सालों के आधारगत प्रभाव 'बेस इफ़ेक्ट' के कारण डिपॉज़िट वृद्धि भी काफ़ी कम दिख रही है। कोविद के दौरान डिपॉज़िट लगभग 10% या 11% की दर से बढ़ रहे थे, इसलिए, मौजूदा 9.9% की डिपॉज़िट वृद्धि पिछले साल के थोड़े ऊँचे आधार पर आधारित है। पिछले एक साल की अवधि में कुल राशि को देखें, तो क्रेडिट वृद्धि के कुल आँकड़े ₹19 लाख करोड़ हैं और डिपॉज़िट ग्रोथ ₹17.5 लाख करोड़ है। इसलिए, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डिपॉज़िट ग्रोथ और क्रेडिट ग्रोथ के बीच कोई बहुत बड़ा अंतर है। इन दोनों का 'बेस इफ़ेक्ट' ही इन्हें एक-दूसरे से ज़्यादा अलग दिखा रहा है। इस समय मैं यह कहना चाहूँगा कि क्रेडिट वृद्धि अर्थव्यवस्था के मूल आर्थिक आधारों और उसकी वृद्धि को दर्शाती है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

क्या आपको लगता है कि बैंकिंग प्रणाली बचत करने वालों के साथ काफी हद तक अन्याय करती है? क्योंकि आपने नेगेटिव इंटरेस्ट रेट (नकारात्मक ब्याज दर) के बारे में भी बात की थी। ऋण की दरों के लिए आपके पास एक बाहरी बेंचमार्क है; लेकिन जमा (डिपॉजिट) के लिए यह स्वतंत्र है। तो अगर आप बचत करने वालों को बैंकों की तरफ आकर्षित करना चाहते हैं, तो क्या करने की ज़रूरत है?

शक्तिकांत दास:

सभी बड़े बैंकर यहाँ मौजूद हैं। ज़्यादातर बैंकों ने पहले ही जमा दरों (डिपॉजिट रेट्स) को बढ़ाना शुरू कर दिया है। आगे चलकर, वे एक कमर्शियल फ़ैसला लेंगे, क्योंकि उन्हें जमा की ज़रूरत तो है ही। बैंकों के पास काफ़ी मात्रा में अतिरिक्त एसएलआर धारिता भी हैं, जिनका इस्तेमाल वे जब चाहें तब कर सकते हैं। नए ऋण पर भारित औसत उधार दर ( वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट) लगभग 117 आधार अंक बढ़ गया है। मुझे 117 इसलिए याद है क्योंकि मेरे छात्र जीवन के दौरान,डीटीसी की एक बस थी जिसका नंबर 117 था। पिछली बार जब मैंने यह नंबर पढ़ा तो मुझे वही डीटीसी बस याद आ गई; इसी तरह मुझे 117 याद रहता है। नई जमा के लिए - चाहे वे खुदरा हों या थोक - जमा दरें 150 आधार अंक तक बढ़ गई हैं। जमा दरें बढ़ रही हैं और आगे भी बढ़ेंगी। यह बाज़ार पर निर्भर करता है। उधार दरें और जमा दरें दोनों ही बाज़ार और रिज़र्व बैंक की पॉलिसी रेट पर निर्भर करती हैं। जमा दरें बढ़ रही हैं और हो सकता है कि वे थोड़ी और बढ़ें।

तमाल बंद्योपाध्याय:

धन्यवाद, गवर्नर साहब। आपने डीटीसी बस नंबर 117 के बारे में बात की। मैं सोच रहा था कि क्या यहाँ बैठे श्री दयाल - जो रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के चीफ़ कम्युनिकेशंस ऑफ़िसर और सीजीएम हैं - ने शायद आपके लिए कोई 'अदृश्य टेलीप्रॉम्प्टर' लगा रखा है? जिस तरह से आप एक के बाद एक आँकड़े बता रहे हैं।

शक्तिकांत दास:

मैं अपना एक अनुभव साझा करता हूँ। कुछ खास नंबरों को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप उन्हें अपने किसी निजी अनुभव से जोड़कर देखें। तो 117 जैसे किसी नंबर को याद रखने का यही सबसे बेहतरीन तरीका है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

भारतीय रिज़र्व बैंक की दो भूमिकाएँ हैं। एक है विकासात्मक भूमिका जिसका अर्थ है वित्तीय प्रणाली की स्थिरता आदि। इसमें निगरानी और बाकी सब कुछ शामिल है। हाल के दिनों में निजी बैंकरों का कहना है कि आप थोड़े ज़्यादा ही 'माइक्रो-मैनेजर' (हर छोटी-बड़ी चीज़ में दखल देने वाले) बनते जा रहे हैं और यह कि बैंकिंग प्रणाली को बैंकर खुद नहीं बल्कि आरबीआई चला रहा है। हम जो कुछ भी करते हैं, हमें उन्हें बताना पड़ता है; हमें जो कुछ भी करने की ज़रूरत होती है, हमें उन्हें बताना पड़ता है। वे इसे "माइक्रो-मैनेजमेंट" कहते हैं। क्या उनकी इस बात में कोई सच्चाई है?

शक्तिकांत दास:

मुझे नहीं पता; यह पहली बार है जब मैं ऐसी कोई बात सुन रहा हूँ। मैं बैंकों के प्रबंध निदेशकों और सीईओ के साथ बातचीत करता रहता हूँ। मुझे तो ऐसा कोई एहसास नहीं हुआ। आधिकारिक मुलाकातों के अलावा मैं बैंकिंग क्षेत्र में अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाले बहुत से लोगों को जानता हूँ; व्यक्तिगत तौर पर भी मैं कई लोगों को जानता हूँ और उनसे अलग-अलग बैंकों के बारे में काफी फीडबैक मिलता रहता है। आपके भी दोस्त, रिश्तेदार या उनके बच्चे अलग-अलग बैंकों में काम करते होंगे। इसलिए, आपको उनसे काफी फीडबैक मिलता होगा। मैंने तो इस तरह की कोई बात नहीं सुनी है। शायद,आप जिस बात का ज़िक्र कर रहे हैं, वह हमारे गहन और विस्तृत पर्यवेक्षण से जुड़ी है।

पिछले 3 से 4 वर्षों में, हमने अपनी निगरानी प्रणाली को और भी ज़्यादा मज़बूत और विस्तृत किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में, बैंकों का विफल होना कोई असामान्य बात नहीं है। वहाँ बैंकों के विफल होने के मामले सामने आते रहते हैं; ऐसा होता है और हर कोई इसे स्वीकार कर लेता है। लेकिन भारत में, किसी बैंक का विफल होना न तो आम जनता को स्वीकार्य है और न ही किसी और को; और ऐसे में हर कोई आरबीआई की तरफ ही देखता है। इसलिए, एक नियामक और बैंकिंग प्रणाली के पर्यवेक्षक के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम यह सुनिश्चित करें कि बैंकिंग प्रणाली स्थिर और सुदृढ़ बनी रहे। साथ ही, यह प्रणाली भारतीय अर्थव्यवस्था की उभरती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार हो - एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जो अगले कुछ वर्षों में 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखती है और 2047 तक एक उन्नत अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखती है। हमारा मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक स्थिर और सुदृढ़ बने रहें; इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने अपनी निगरानी के तरीकों को और भी ज़्यादा गहन और प्रभावी बनाया है। हमारा पर्यवेक्षण दृष्टिकोण अत्यंत रचनात्मक और मैत्रीपूर्ण संवाद पर आधारित है।

जब भी हमें कोई मुश्किल आती है या हम चिंतित होते हैं, तो हम सरकारी क्षेत्र या निजी क्षेत्र के बैंक के सीईओ से मिलते हैं और उनके साथ अपनी चिंताएँ साझा करते हैं। अब हम बैंकों के बिज़नेस मॉडल्स पर भी नज़र रख रहे हैं। उदाहरण के लिए, अगर हमें लगता है कि अनसिक्योर्ड रिटेल पोर्टफोलियो—यानी बिना किसी गारंटी के दिए गए लोन और रिटेल लोन - बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं, और वे बैंकों के कुल लोन पोर्टफोलियो में एक बड़ा हिस्सा बना रहे हैं, तो हम तुरंत बैंक को अपनी चिंता से अवगत कराते हैं, लेकिन हम उनके काम में दखल नहीं देते। हम उनसे बस इतना कहते हैं कि कृपया इस मामले को अपनी जोखिम प्रबंधन समिति के सामने रखें। क्या आपकी जोखिम प्रबंधन समिति ने इस पर विचार किया है? क्या आपके बोर्ड ने इस पर विचार किया है? हम यह फैसला बोर्ड पर ही छोड़ देते हैं।

हमारा मकसद यह पक्का करना है कि बैंकिंग प्रणाली मज़बूत और स्थिर बनी रहे। बैंकों के काम में छोटी-छोटी बातों या बड़े स्तर पर दखल देने का किसी का भी कोई इरादा नहीं है। हम इस मामले में बिल्कुल भी दखल नहीं देते, लेकिन जहाँ भी हमें चिंता या किसी गड़बड़ी के कोई संकेत मिलते हैं, वहाँ हम उस मुद्दे को उठाते रहते हैं। हम बैंक के साथ उन मुद्दों पर चर्चा करते हैं, और यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। आरबीआई की निगरानी अब सिर्फ साल के आखिर में की जाने वाली कोई औपचारिकता नहीं रह गई है। यह अब साल भर लगातार चलने वाली एक प्रक्रिया बन गई है। हम बैंकों के साथ हमेशा सलाह-मशविरे वाला रवैया अपनाते हैं। शुरू से ही - नी चार साल पहले जिस दिन मैंने रिज़र्व बैंक में अपना पदभार संभाला था - उसी दिन मैंने यह साफ़ कर दिया था कि हम हमेशा सलाह-मशविरे वाला रवैया ही अपनाएँगे। आरबीआई गवर्नर का पद संभालने के बाद मैंने जो पहली मीटिंग की थी - जिसकी घोषणा मैंने पदभार संभालने के दिन ही कर दी थी - वह पब्लिक और प्राइवेट, दोनों ही सेक्टर के बैंकों के मुख्य अधिकारियों के साथ की गई एक सलाह-मशविरा मीटिंग थी। इसलिए, चाहे बैंक हों या वित्तीय क्षेत्र के दूसरे खिलाड़ी, हम सभी के साथ सलाह-मशविरे वाला रवैया ही अपनाते हैं। बैंकों के साथ हमारे रिश्ते बहुत ही रचनात्मक और सकारात्मक हैं।

तमाल बंद्योपाध्याय:

अब आईबीसी की बात करते हैं। आईबीसी 2016 में अस्तित्व में आया। पहले बैच में जिसमें एस्सार और कई दूसरी कंपनियाँ शामिल थीं,रिकवरी काफी अच्छी रही,लेकिन उसके बाद इसमें सुस्ती आने लगी। अब एनबीएफसी भी आईबीसी के दायरे में आ रही हैं। कम से कम दो ऐसे मामले सामने आए हैं। मैं उनके नाम नहीं लूँगा। उन्हें जो ऑफर मिल रहे हैं वे उनकी लिक्विडेशन वैल्यू (संपत्ति बेचकर मिलने वाली कीमत) से काफी कम हैं। इसलिए जब आप एनबीएफसी के लिए भी आईबीसी लागू करते हैं तो कुछ न कुछ करने की ज़रूरत है। यह एक पूरी तरह से विनाशकारी स्थिति है। पहली नज़र में आँकड़ों को देखते हुए ऐसा लगता है कि कुछ ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।

शक्तिकांत दास:

सबसे पहली बात यह है कि हमें आईबीसी को सिर्फ़ ऋण वसूली के एक ज़रिया के तौर पर नहीं देखना चाहिए। यह एक नया कानून है। इसे 2016 में बनाया गया था। इसे लागू हुए 6 साल हो चुके हैं लेकिन फिर भी यह एक नया कानून ही माना जाएगा।

नए कानूनों के इर्द-गिर्द कानूनी सिद्धांत धीरे-धीरे विकसित होते हैं। उच्चतम न्यायालय के कई फ़ैसले आ चुके हैं और अब आईबीसी से जुड़े कानूनी सिद्धांत काफी हद तक स्पष्ट और स्थापित हो चुके हैं। आईबीसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसमें लगने वाला समय है। शुरुआत में यह सोचा गया था कि कुछ काम 15 दिनों में पूरे हो जाएँगे जबकि कुछ कामों में 90 दिन या 6 महीने का समय लगेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, इसके कई कारण हैं। इसलिए इसमें देरी का एक अहम पहलू शामिल है। दूसरा पहलू यह है कि यह सिर्फ़ वसूली का ज़रिया नहीं है। फिर भी आप कितनी रकम वसूल कर पा रहे हैं या कितनी वसूली हो रही है यह बात बहुत मायने रखती है; इसे आप यूँ ही नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। यह एक बेहद ज़रूरी पहलू है। जब मैं कहता हूँ कि यह सिर्फ़ वसूली का ज़रिया नहीं है तो इसे सही संदर्भ में समझा जाना चाहिए। वसूली ज़रूरी है - मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा हूँ - लेकिन अगर आप इसकी तुलना पिछली व्यवस्था से करें (जब बीआईएफआर फ्रेमवर्क लागू था,या पिछले कई सालों से जो दूसरे फ्रेमवर्क चले आ रहे थे),तो उनके मुकाबले आईबीसी के तहत होने वाली रिकवरी—खासकर आँकड़ों के लिहाज़ से—कहीं ज़्यादा बेहतर है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि आईबीसी की प्रक्रिया को सही समय पर शुरू किया जाए। परंपरागत रूप से, तरीका यह रहा है कि आप किसी एसेट के एक हद तक खराब होने का इंतज़ार करते हैं और फिर उसे आईबीसी के सामने रखते हैं। अब जो ज़रूरी है, वह यह पहचानना है कि किसी खास पोर्टफोलियो में शुरुआती दिक्कतें कहाँ हैं और उसे समय पर आईबीसी के पास भेजना ताकि न सिर्फ़ क्रेडिट की रिकवरी बेहतर हो बल्कि कंपनी भी कहीं ज़्यादा बेहतर तरीके से फिर से खड़ी हो सके। इसलिए, आईबीसी के प्रावधान को सही समय पर लागू करना भी उतना ही ज़रूरी है और इसमें सुधार हो रहा है। आईबीसी की धारा 227 के तहत हमें एनबीएफसी पर इसे लागू करने की शक्तियाँ दी गई थीं। जैसे ही जुलाई 2020 में हमें ये शक्तियाँ मिलीं - साथ ही आवास वित्त कंपनियों के संबंध में नियामकीय शक्तियाँ भी - हमने 2-3 महीनों के भीतर ही पहला मामला आईबीसी के पास भेज दिया। उसके बाद, दो और मामले आए जिन्हें अब आईबीसी के पास भेज दिया गया है। आइए, हम नतीजों का इंतज़ार करें। यह प्रक्रिया अब काफ़ी आगे बढ़ चुकी है। दोनों ही मामले अब काफ़ी आगे के चरण में हैं।

तमाल बंद्योपाध्याय:

2024 का बजट बस कुछ ही महीनों दूर है। उसके ठीक बाद भारतीय रिज़र्व बैंक की एमपीसी बैठक होगी। यह चुनावों से पहले का आखिरी बजट है। चलिए मान लेते हैं कि चुनावों से पहले पूरी अर्थव्यवस्था के प्रति दृष्टिकोण में एक अलग तरह का बदलाव आता है। प्रशासन महंगाई के बजाय विकास के बारे में ज़्यादा बात करना चाहेगा। क्या आपको लगता है कि चुनावों से पहले अब आपका काम और मुश्किल हो जाएगा? आपने बताया था कि जमा बढ़ रही है और बैंकों के पास पर्याप्त अतिरिक्त एसएलआर है जिसे वे सरकार के उधार कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर मीडिया रिपोर्टों पर गौर करें तो वे लगभग 5.0%-6.0% के राजकोषीय घाटे की बात कर रहे हैं। इस साल हमारा सरकारी उधार कार्यक्रम ऐतिहासिक रूप से बहुत ज़्यादा था जिसे आपने लगभग पूरा कर ही लिया है लेकिन प्रतिफल बढ़ गया है क्योंकि ऋण की मांग है।

पिछले 2 सालों में, हम प्रतिफल(यील्ड) को नियंत्रित कर पाए थे क्योंकि क्रेडिट की कोई मांग नहीं थी और पर्याप्त चलनिधि उपलब्ध थी। अब चलनिधि का संतुलन धन(प्लस) और ऋण(माइनस) के बीच बना हुआ है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार कैसे खर्च कर रही है। इसलिए, अब आपको वह फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि क्रेडिट की मांग मौजूद है। तो सरकारी उधार कार्यक्रम उतना आसान नहीं होगा जितना आपने अब तक संभाला है। शायद आपको यील्ड को बढ़ने देना होगा। यह एक तरह की मैक्रो पृष्ठभूमि है। एक गवर्नर के तौर पर क्या आपको लगता है कि अब यह और मुश्किल होगा? अब तक आप यही कहते रहे हैं कि महंगाई सबसे बड़ी दुश्मन है और आपके हालिया बुलेटिन में भी महंगाई वगैरह के बारे में बात की गई थी। तो आगे चलकर क्या विकास-महंगाई का समीकरण बदल जाएगा क्योंकि चुनाव अब बस दरवाज़े पर दस्तक देने ही वाले हैं?

शक्तिकांत दास:

क्या बदलेगा, यह मैं अभी नहीं कह सकता। अगली मौद्रिक नीति आने में अभी डेढ़ महीना बाकी है। तब तक बहुत कुछ हो सकता है। वैसे भी हमारे मन में क्या है यह एमपीसी की तारीख करीब आने पर ही तय होगा। इस बीच बहुत कुछ हो सकता है और हम उसी समय फैसला लेंगे। वैसे भी अगली एमपीसी में हम क्या करेंगे इस पर अभी टिप्पणी करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। हालांकि मैं यह बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि जहां तक मौद्रिक नीति बनाने की बात है, 2024 में होने वाले चुनाव इसमें बिल्कुल भी कोई कारक नहीं हैं। मौद्रिक नीति बनाने का मकसद महंगाई को रोकना और नियंत्रित करना है। सरकार भी महंगाई को नियंत्रित करने को लेकर उतनी ही गंभीर है।

मुझे यह कहना ही होगा कि महंगाई को रोकने के लिए, रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच बहुत ही तालमेल भरा अप्रोच रहा है; हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, हमने दरों, रुख और लिक्विडिटी (तरलता) के मामले में कई कदम उठाए हैं। सरकार ने भी सप्लाई-साइड से जुड़े कई कदम उठाए हैं, जैसे पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स कम करना और कई दूसरी इंपोर्टेड खाने की चीज़ों पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाना।

हर कोई महंगाई को नीचे लाने में दिलचस्पी रखता है और मुझे पूरा यकीन है कि सरकार भी महंगाई को नीचे लाने के लिए उतनी ही उत्सुक होगी। लेकिन, मौद्रिक नीति के लिए क्या मायने रखता है? आप 'अर्जुन की नज़र' वाली कहावत का इस्तेमाल करते हैं। अर्जुन सिर्फ महंगाई और विकास पर नज़र रखता है। अर्जुन इस बात पर ध्यान नहीं देता कि चुनाव आने वाले हैं या नहीं। दूसरे शब्दों में, मैं यह कहना चाहता हूं कि भारत में लगभग हर साल चुनाव होते हैं। कई राज्यों में भी एक साथ चुनाव होते रहते हैं। इसलिए जहां तक मौद्रिक नीति बनाने की बात है, चुनाव कोई मुद्दा नहीं है और मौद्रिक नीति वही करेगी जो अर्थव्यवस्था के सबसे अच्छे हित में होगा।

तमाल बंद्योपाध्याय:

मेरा आखिरी सवाल, हर कोई जी-20 में भारत की अध्यक्षता के बारे में जानना चाहेगा। तो आप इसे कैसे देखते हैं? आपको इसमें क्या अवसर नज़र आते हैं?

शक्तिकांत दास:

यह भारत के लिए एक बहुत बड़ा अवसर है। यह भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका देता है। अब विश्व मंच पर भारत की भूमिका कहीं ज़्यादा बड़ी हो गई है। भारत जी-20 की सभी बैठकों की अध्यक्षता करेगा। यह भारत के लिए एक बड़ी भूमिका निभाने का मंच है। विश्व समुदाय के लिए - सिर्फ़ भारत के लिए ही नहीं बल्कि जी-20 के लिए भी - सबसे बड़ा काम बहुपक्षवाद में विश्वास और उसकी प्रभावशीलता को बहाल करना है। आख़िरकार, जी-20 दुनिया की 85% जीडीपी और लगभग 75% विश्व व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। एक समूह के तौर पर जी-20 का बाकी दुनिया के लिए बहुत ज़्यादा महत्व है।

पिछले कुछ सालों में, ऐसा लगता है कि बहुपक्षवाद अपनी प्रभावशीलता खो रहा है - चाहे वह कोविद से लड़ने के संदर्भ में हो या फिर दुनिया की दूसरी अलग-अलग समस्याओं से निपटने के संदर्भ में। भारत का मूल विषय है ‘वसुधैव कुटुंबकम’- यानी ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’। इसलिए, ‘एक भविष्य’ ही सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है। एक समूह के तौर पर जी-20 को मिलकर इस बात पर ध्यान देना होगा कि सबसे ज़रूरी काम बहुपक्षवाद के इर्द-गिर्द बने विश्वास और उसकी प्रभावशीलता को फिर से बहाल करना है। आज भारत - चाहे आप इसे दुनिया के विकास के नज़रिए से देखें या फिर आज दुनिया में चल रही मौजूदा भू-राजनीति के नज़रिए से, इस भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए एक अनोखी स्थिति में है।

तमाल बंद्योपाध्याय:

इस ऑडियंस के लिए कोई संदेश? इसमें बैंकर,एनबीएफसी, इंश्योरेंस कंपनियाँ और म्यूचुअल फंड शामिल हैं - यानी संपूर्ण भारतीय वित्तीय प्रणाली का एक छोटा रूप यहाँ मौजूद है। यूट्यूब और दूसरे चैनलों के अलावा, यहाँ एक बड़ी स्क्रीन भी है और दूसरे कमरे में भी लाइव प्रसारण हो रहा है। उनके लिए कोई आखिरी, एक वाक्य का संदेश?

शक्तिकांत दास:

एक वाक्य नहीं, बल्कि शायद 3-4 वाक्य। एक बात जो मैं कहना चाहूँगा, वह यह है कि पिछले 3 सालों में दुनिया ने एक के बाद एक बहुत ज़्यादा गंभीरता वाले कई झटके देखे हैं - एक के बाद एक 3 'ब्लैक स्वान'घटनाएँ। मैंने इस बारे में पहले भी बात की है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय वित्तीय क्षेत्र मज़बूत बने हुए हैं और कहीं ज़्यादा बेहतर स्थिति में हैं। इसका श्रेय सिर्फ़ विनियामकों को ही नहीं जाता, बल्कि वित्तीय क्षेत्र के सभी हिस्सेदारों और खिलाड़ियों को जाता है; हम सबने मिलकर यह किया है। जैसे ही हम 2023 में कदम रखते हैं हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि सारी समस्याएँ खत्म हो गई हैं; नई चुनौतियाँ और नई लड़ाइयाँ सामने आ सकती हैं, जिन पर हमें काम करना होगा। हम सबको आशावादी बने रहना चाहिए और मिलकर काम करना चाहिए जैसा कि हमने पिछले 3 सालों में किया है। मुझे पूरा यकीन है कि हम मिलकर काम करेंगे - भले ही आपने कुछ बैंकों के बीच मतभेद होने और उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ने की बात कही हो। इन सब बातों के बावजूद मुझे पूरा भरोसा है कि वित्तीय क्षेत्र के खिलाड़ी और रेगुलेटर - सिर्फ़ आरबीआई ही नहीं बल्कि दूसरे रेगुलेटर भी - भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मज़बूती और क्षमता को बनाए रखने और उसे और मज़बूत करने के लिए मिलकर काम करेंगे।

धन्यवाद।

तमाल बंद्योपाध्याय:

धन्यवाद, सर। यह आत्मविश्वास, आशावाद और सावधानी है। मैं इसे संक्षेप में बताकर ज़्यादा समय नहीं लेना चाहता। हर अच्छी चीज़ की तरह यह भी अब समाप्त हो गया है। इतने बेबाक होने के लिए और उन सवालों तथा टिप्पणियों पर बुरा न मानने के लिए आपका धन्यवाद जो सुनने में आलोचनात्मक लग सकते थे। मैंने बैंकरों वगैरह के बीच जो बातें सुनीं उन्हें मैंने सबकी मौजूदगी में आपसे पूछने की हिम्मत की। श्री दास ने अपने 4 साल पूरे कर लिए हैं। पिछले हफ़्ते उन्होंने अपना 5वाँ साल शुरू किया। जब वे अपने 6 साल पूरे कर लेंगे- यह मानते हुए कि उन्हें कोई और विस्तार नहीं मिलेगा - तो भारतीय रिज़र्व बैंक के 87 साल के इतिहास में वे 6 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे गवर्नर होंगे। इसलिए, उनके सम्मान में ज़ोरदार तालियाँ।

धन्यवाद, सर।


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